Sunday, May 16, 2010

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Tuesday, March 16, 2010

मुम्बई किसकी है मुझे पता नहीं,

मुम्बई किसकी है मुझे पता नहीं, लेकिन जब कभी भी भारत का नक्शा देखता हूं तो वह मुझे वर्तमान भारतीय संघ का ही हिस्सा दिखता है। छात्र जीवन में हम लोग नारा लगाते थे, कश्मीर हिन्दुस्तान का, नहीं किसी के बाप का, बाप के बाप का। हालांकि मुम्बई के लिए तत्काल ऐसे नारे की जरूरत तो नहीं है लेकिन जिस प्रकार कुछ अलगाववादी मुम्बई के लिए हुडदंग कर रहे हैं उसमें तो देश के राष्ट्रवादियों को कुछ सोचना चाहिए। मुम्बई का इतिहस है कि वह सात छोटे-छोटे द्वीपों में बंटा हुआ था। पारसी गुजराती व्यापारियों ने पैसा लगाया और उत्तर भारतीय मजदूरों ने अपने सिर पर मिट्टी ढोकर मुम्बई को बनाया। महाराष्ट्र के लोग अगर मुम्बई पर केवल अपना हक जमा रहे हैं तो यह अच्छी बात नहीं है, लेकिन आखिर यह नौबत आयी क्यों, इसपर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
अपने जीवन में कुल तीन बार मुम्बई की यात्रा किया हूं। पहली बार एक छात्र संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन में गया। दूसरी बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने प्रचारक से मिलने गया और तीसरी बार व्यक्तिगत काम से मुम्बई गया। तीसरी बार जब मुम्बई गया तो कोई दामले जी करके मिले। बूढे, लेकिन युवाओं वाला उत्साह। एक गांगोडे भी मिले जिन्होंने दादर रेलवे स्टेशन तक मुझे छोडा, यहां तक कि हमारा समान ट्रेन में लाकर रख दिया। अब यह सोच कर चकित हूं कि आखिर मुम्बईकर कैसे तंगदिल हो सकते हैं। पिछले दिनों बिहार का एक लडका कारतूस भरे तमंचे लहराने के जुल्म में मार गिराया गया। मुझे भी अच्छा नहीं लगा लेकिन कोई तमंचा लहराये क्या उसे फूल चढाना चाहिए? कोई बिहार या फिर उत्तर प्रदेश का हो तो उसे मुम्बई में आरक्षण दिया जाये कि आप यहां गुंडागर्दी करने के लिए मुक्त हो? देखिए कोई किसी प्रांत में जाता है तो उसे वहां के अनुकूल ही रहना चाहिए। यह भी निर्विवाद सत्य है कि मुम्बई तो महाराष्ट्र की ही राजधानी है। कोई पटना या फिर रांची या फिर लखनउ में जा कर कहे कि यहा मुझे हुडदंग करने की छूट दी जाये तो नहीं चलेगा। इतना तो ठीक है, लेकिन मुम्बई में हिन्दी भाषियों को खदेड देंगे। मुम्बई में जो हिन्दी बोलेगा उसके खिलाफ फतवा जारी किया जाएगा और फिर एक परिवार के लोगों की केवल मुम्बई है, तो यह तो नहीं होगा। बाला साहेब हों या फिर कोई और इस देश के वर्तमान राजनीतिक नक्शे में जो भी दिखाया जा रहा है वहां जाकर काम करना इस देश के किसी नागरिक का अधिकार है, जो इस अधिकार के खिलाफ आवाज बुलंद करता है उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकद्दमा किया जाना चाहिए। लेकिन करे कौन? सबकी फसी हुई है।
आज जिस मराठा छत्रप का उदय हो रहा है उसके पीछे इतिहास उत्तरदायी है। एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगा। जिस प्रकार सरदार बल्लभ भाई पटेल के राष्ट्रवादी चिंतन का विस्तार आज का गुजरात है उसी प्रकार विनोवा भावे जी के चिंतन का विस्तार आज का मराठी पृथक्तावाद है। विनोवा भावे को हम सच्चे देशभक्त के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने देश में एक नया आन्दोलन चलाया लेकिन भाषा के सवाल पर वे यह कभी नहीं मानते थे कि पूरा भारत एक है। उन्होंने इशावाष्यवृति नामक पुस्तक में एक जगह लिखा है कि मराठी भाषा संस्कृत से भी पुरानी भाषा है। इसे आप क्या कहेंगे। क्या यह मराठा पृथक्तावाद का बीज नहीं है? विनोवा जी बडे विद्वान आदमी थे। भाषा पर पकड थी, परंतु इतना नहीं जान पाये कि वेद की भी भाषा किसी जमाने में लोकभाषा थी और जब लोकभाषा में व्याकरण के द्वारा परिष्कार होता है तो वह भाषा व्यवस्थित हो जाती है। संस्कृत के साथ भी ऐसा ही हुआ है। आर्यावर्त में उस समय बोली जाने वाली भाषा को जब महापंडित पाणिनि ने आष्टाध्यायी की कसौटी पर कस दिया तो उसे संस्कृत भाषा की संज्ञा दी गयी। मराठी एक लोक भाषा है उसके कुछ शब्द अति प्राचीन हो सकते हैं, लेकिन उन शब्दों को आधार मान कर यह कहा जाये कि मराठी भाषा संस्कृत से भी पुरानी भाषा है तो यह ठीक नहीं है। यह भावे का भाषा ज्ञान नहीं भाषा के प्रति पूर्वाग्रह है। हर को अपनी भाषा और अपनी संस्कृति प्यारी है, लेकिन यह कहना कि हमारी ही संस्कृति और भाषा पुरानी है इसे कैसे कोई ठीक ठहराएगा। सकारात्मक सोच भी जब रूढ हो जाता है तो वहीं से नकारात्मकता की शुरूआत होती है। आज का मराठावाद उसी मानसिकता का विस्तार है। दुसरा उदाहरण यह है कि मराठियों को यह लगता है कि शिवाजी महाराज ने ही हिन्दुओं को बचाया। फिर यह भी लगता है कि दिल्ली पर तो मराठों का शासन था, मुगल बादशाह तो कठपुतली थे। लेकिन मराठों को यह भी समझना चाहिए कि वे केवल सरदेशमुखी और चौथ वसूलने के लिए ही थे। दिल्ली पर तो शासन मुगलों का ही था। मराठें अगर इतने प्रबुध्द होते तो उस समय पैसा नहीं राज्य देखते और मुगलों की हत्या कर देश की कमान अपने हाथ में ले लेते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर बाद में अंगरेज आ गये और सबको परास्त होना पडा। अंगरेजों के जाने के बाद जिस भारत का निर्माण हुआ है उस भारत में सबकी हिस्सेदारी बराबर की है। सबको सभी जगह जाने का हक, कमाने का हक है, लेकिन शालीनता से।
मुम्बई में वर्तमान परिस्थिति के लिए हिन्दी भाषी खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भी दोषी हैं। एक हमारे गांव का बेरोजगार लडका मुम्बई गया। गांव में उसने किसी का भला नहीं किया। उलट जिसकी चाहे उसका खेत अपनी भैंस ले जाकर चरा देता। गांव के लोगों की नाक में दम कर रखा था। मुम्बई गया, पता नहीं वहां जाकर क्या किया, आज बडी संपति का मालिक है। बगल के गांव का एक लडका मुम्बई गया। सुना बडा भारी बदमाश होकर लौटा है। मुम्बई में जितने भी बडे बदमाश है उसमें से लगभग 80 प्रतिशत बिहार या उत्तर प्रदेश के लोग हैं। अब कोई कहे कि ये लोग केवल वहां कमाने के लिए जाते हैं तो यह मानने वाली बात नहीं है। फिर लोकभाषा का तो विकास होना ही चाहिए। महाराष्ट्र में मराठी भाषा का विकास न होगा तो कहां होगा। इसलिए कोई ठाकरे यह कहता है कि मुम्बई में मराठी भाषा ही होनी चाहिए तो इसमें कोई आपति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जिस रूप में कहा जा रहा है उससे देश के संघीय ढांचे में दरार पडने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
अब रही बात बिहार कि, तो अभी लोगों को यह बात समझ में नहीं आ रही है, लेकिन बिहार में अलगाववाद पैदा हो गया तो देश को एक रखना कठिन हो जाएगा। क्योंकि बिहार में अलगाववाद का पैदा होना कश्मीर या महाराष्ट्र के तरह का नहीं होगा। बिहारी कहीं जाता है तो उसे ताकत से नहीं हटाया जा सकता है। वर्तमान समय में भी बिहारियों ने अपनी ताकत पर दुनिया में कई देश बनाये हैं और अंत में एक उदाहरण और कि नेपाल में आज देश का संवैधानिक प्रधान उसी माटी का सपूत है। यह बिहार की ताकत है। याद रहे ज्ञात दुनिया पर दो ही चिंतन राज किया है पहला बिहारियों का दूसरा यहूदियों का। लोग बिहारियों को कहते है कि वह यहां आ गया, वह यहां आ गया, मैं तो कहता हूं कि चीन अपनी सीमा खोल कर देख ले बिहारी विजिंग में जाकर अपना झंडा गाड देगा। ठाकरे साहब बिहारियों को कम करके नहीं आंके। बिहार अब आकार लेने लगा है। चंद गुंडों के कारण पूरे बिहार को बदनाम करने की साजिश बंद होनी चाहिए। नहीं तो देश को नहीं बचाया जा सकता है। लोग माने या नहीं लेकिन देश को एक रखने की चाभी केवल और केवल बिहारियों के पास है बिहारी चाह ले तो वर्तमान भारत को टुकडों में विभाजित करने में मात्र दो साल का समय लगेगा। यह अति उत्साह में नहीं पूरा गणित इसके पीछे है। जिसका खुलासा यहां पर करना ठीक नहीं है। जिस प्रकार देश के दुश्मन देश को तोडने के फिराक में है उसमें बिहार सबके टारगेट में है। मुगल बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सेना पर देश में टिक पाये। बिहार और पुरबियों की ताकत को अगरेजों ने पहचाना और इसी क्षेत्र के सैन्य ताकत पर वह देश में 200 साल तक राज किया। मराठे वीर होते हैं। सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन जिस प्रकार वे मां भारती के पुत्र हैं उसी प्रकार बिहारी भी है, जिसका सम्मान होना चाहिए। निसंदेह मुम्बई मराठियों का है लेकिन वहां रोजगार और व्यापार करने से किसी को रोका जाना देश की संप्रभुता के साथ खिलवाड है। साथ ही जो लोग मुम्बई जा रहे हैं उन्हें वहां रोजगार या व्यापार की छूट मिल सकती है गुंडागर्दी की छूट किसी भी कीमत पर नहीं दिया जाना चाहिए। दाउद कहां तो उत्तर प्रदेश के, जम्बो खान कहां तो बिहार के, छोटा सकील कहा तो उत्तर प्रदेश का, छोटा राजन कहां तो उत्तर प्रदेश का, भाई इस प्रकार गुंडागर्दी तो नहीं किया जाना चाहिए लेकिन आज ठाकरे बंधु उन गुंडों से डरते हैं और साफ्ट टारगेट बिहारी मजदूरों को बना रहे हैं। इससे न तो उनका लाभ होगा और न ही मराठियों का भला होगा। थोडा-थोडा संयम सबको रखना पडेगा। उत्तर भारतीयों को केवल रोजगार की छूट है और ठाकरे बंधुओं को शांति से अपनी बात रखने की छूट है। अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा में दोनों रहे तो देश का हित होगा अन्यथा फिर देश को कोई टुटने से नहीं बचा सकता है।
-इमरान हैदर

Monday, March 15, 2010

संबंधों का अन्त है पोर्न

पोर्न देखना आज आम बात हो गई है। पोर्न से बचना अब असंभव सा होता जा रहा है। पोर्न ने जिस तरह समूचे दृश्य संसार को घेरा है, उतनी तेजी से किसी विधा ने नहीं घेरा। पोर्न के सवाल हमें परेषान करते हैं। राज्य के हस्तक्षेप की मांग करते हैं। सामाजिक हस्तक्षेप की मांग करते हैं। पोर्न का सामाजिक विमर्श में आना इस बात का संकेत है कि समाज परवर्ती पूंजीवाद के सांस्कृतिक विमर्ष में दाखिल हो चुका है। खासकर इंटरनेट के आने के बाद पोर्न सहजता से उपलब्ध है, पोर्न विमर्श भी सहजभाव से उपलब्ध है। पोर्न से बचने का सॉफ्टवेयर भी सहज उपलब्ध है।
 आज पोर्न शरीफों का मनोरंजन है। विज्ञापन,फिल्म,मोबाइल,पत्रिका,इटरनेट आदि सभी माध्यमों के जरिए पोर्न हम तक पहुँच रहा है। एक सर्वे के अनुसार ब्रिटेन में सन् 2000 तक तकरीबन 33 फीसदी इंटरनेट यूजर पोर्न का इस्तेमाल कर रहे थे। अमेरिका में पोर्न उद्योग का कारोबार 15 विलियन डालर सालाना आंका गया है। वर्ष में फिल्मों की टिकट और ललित कलाएं खरीदने से ज्यादा लोग पोर्न पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। अमेरिका में अकेले लॉस एंजिल्स में सालाना दस हजार हार्डकोर पोर्न फिल्में तैयार हो रही हैं। जबकि हॉलीवुड साल में मात्र 400 फिल्में बना पाता है।
पोर्न व्यवसाय का दायरा बहुत बड़ा है। इसकी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति बढ़ रही है। आज यह फैशन का रूप धारण कर चुका है। पोर्न के संदर्भ में पहला सवाल यह उठता है कि पोर्न को औरतें ज्यादा देखती हैं या मर्द ? सर्वे बताते हैं पोर्न पुरूष ज्यादा देखते हैं, पोर्न सबकी क्षति करता है। यह सामयिक पूंजीवादी फैशन है। यह अपने तरह का खास सम्मान दिलाता है।
एडवर्ड मारियट ने ‘मैन एण्ड पोर्न’(गार्दियन,8नबम्वर2003) में लिखा कि पोर्न आज ज्यादा स्वीकृत धंधा है, ज्यादा फैशनेबिल ज्यादा आरामदायक है,सबसे बड़ा व्यापार है, आज स्थिति यह है कि इसका सभ्य समाज के आनंद रूपों में स्वीकृत स्थान है।
पोर्न को हम वर्षों से देख रहे हैं कि किन्तु हमने कभी इसका विश्लेषण नहीं किया कि किस तरह इसने स्त्री का दर्जा गिराया है। यह समयानुकूल पूंजीवादी फैशन है। यह सिर्फ औरत ही नहीं सारे समाज को पतन के गर्त में मिलाया है। यह बात बार-बार कही जा रही है कि पश्चिम में औरतें खूब पोर्न देख रही हैं किन्तु सच यह है कि पोर्न मर्द ज्यादा देख रहे हैं। यह मूलत: मर्द विधा है।
 पोर्न की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में परिभाषा है सन् 1864 से ‘वेश्या के अपने संरक्षक के प्रति जीवन, हाव-भाव’ पोर्न है। बाद में चेम्बर ने लिखा ‘कामुक उत्तेजना पैदा करने वाली सामग्री’ को पोर्न कहते हैं। इसका साझा थीम है पावर और समर्पण। जिसका आधार है वेश्या। जबकि ‘कामुकता’ (इरोटिका) में पोर्न की तुलना में नियंत्रण और वर्चस्व कम होता है।
 पोर्न मनुष्य की बुनियादी जिज्ञासाओं को शांत करती है। जो पोर्न के आदी हो जाते हैं, वे अन्य किसी के साथ मिल नहीं पाते। पोर्न मर्द के बारे में झूठी धारणाएं पैदा करती है। स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में झूठी धारणा बनाती है। उत्तेजना पैदा करने के नाम पर पोर्न मर्द का शोषण करती है। स्त्री के प्रति घृणा पैदा करती है। मर्द और दोनों के बीच आत्मीयता का झूठा वायदा करती है। संक्रमण काल में सिर्फ हस्तमैथुन का विकल्प पेश करती है। पुरूष जब अकेला होता है, कामुक तौर पर कुण्ठित हो तब वह पोर्न देखता है।
 पोर्न की लत शराब की लत की तरह है जो सहज ही छूटती नहीं है। अनेक मर्तबा पति अपनी पत्नी को साथ में बिठाकर पोर्न देखने के लिए दबाव डालता है और यह तर्क देता है इससे कामोत्तेजना बढ़ेगी सेक्स में मजा आएगा, बाद में स्वयं के मैथुन दृश्यों को कैमरे से उतारता है और सोचता है कि वह तो पोर्न से बाहर है किन्तु सच यह है कि इससे ज्यादा अमानवीय चीज कुछ भी नहीं हो सकती।
 पोर्न का मूल लक्ष्य है अन्य व्यक्ति को अमानवीय बनाना, संबंध को अमानवीय बनाना,आत्मीयता को अमानवीय बनाना। इसके अलावा जो लोग पोर्न देखकर अपनी पत्नी से प्यार करना चाहते हैं, ऐसी पत्नियों के लिए पोर्न दर्दनाक अनुभव है। वे इसमें एकसिरे से आनंद नहीं ले पाती हैं।
 जो लोग पोर्न का इस्तेमाल करते हैं वे अंदर से मर चुके होते हैं। वे अपने इस मरे हुए के दर्द से ध्यान हटाने के लिए पोर्न का इस्तेमाल करते हैं। पोर्न एक तरह से बच्चे का मनोविज्ञान भी है जहां बच्चा माता-पिता के नियंत्रण से मुक्त होकर जीना चाहता है। पुरूष के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो मर्द पोर्न ज्यादा देखते हैं वे अंदर से खोखले हो जाते हैं,संबंध बनाने में असमर्थ होते हैं। पोर्न मर्द को मजबूर करती है कि वह खोखले संबंध बनाए।
 पोर्न की लत अवसाद की सृष्टि करती है। पोर्न मर्द को मुक्ति नहीं देता, बल्कि लत पैदा करता है, लत का गुलाम बनाता है। इसके अलावा कामुक हिंसाचार में भी इसकी भूमिका है। पोर्न से बचने का आसान तरीका है कि आप अपने कम्प्यूटर को जबावदेह बनाएं, अन्य आपके कम्प्यूटर को देख सके कि आप क्या देख रहे हैं। पारिवारिक संबंधों में मधुरता हो, बच्चों से प्यार हो, तो पोर्न से बचा जा सकता है।

आखिर सिंह तो गरजेगा ही –

इन दिनों एक गरम खबर चर्चा में है। खबर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच तनाव बढ़ रहा है। दोनों के बीच तनाव की एक लकीर खींच गई है। हालांकि इसके कई कारण बताए जा रहे है। पर इन कारणों में कितनी सच्चाई है इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। दूसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी पारी शुरू करने के बाद जिस सिंह को बकरी के तौर पर लिया जा रहा था वो अब सिंह की तरह गरज रहा है। कई फैसले अपने मर्जी से मनमोहन सिंह ने लिए है। इसमें सोनिया गांधी की सहमति नहीं बतायी जा रही है। कुछ फैसलों पर तो सोनिया गांधी ने नाराजगी भी जतायी है। कह सकते है कि पार्टी में एक बार फिर सता को लेकर विवाद की शुरूआत हो सकती है। हालांकि यह भी कयास लगाया जा रहा है कि कुछ शरारती कांग्रेसियों ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच दूरी बढ़ाने के लिए यह अफवाह फैलायी हो।
कुछ जगहों पर खबर लगी है कि सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के कुछ लिए गए फैसलों से नाराज है। इन फैसलों में संत सिंह चटवाल को पदमश्री देना, शर्म अल शेख में कांग्रेस पार्टी की लाइन से अलग जाकर पाकिस्तान के साथ जारी ज्वाइंट स्टेटमेंट में भारत के हितों की अनदेखी करना और बीटी बैंगन को लेकर मनमोहन सिंह का स्टैंड है। बताया जाता है कि इन सारे मामलों में मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी से फैसला लिया है। इस फैसले से सोनिया गांधी नाराज है। निश्चित तौर पर यह कारण ताजा विवाद के कारण हो सकते है। पर विवाद की शुरूआत यहां से नहीं हुई है। इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने कुछ फैसले लिए थे जो सोनिया गांधी को पसंद नहीं थे।
प्रधानमंत्री ने 2009 में जब दूसरी बार अपनी पारी शुरू की तो मंत्रीमंडल के गठन के वक्त ही एक विवाद हो गया था। वो विवाद था अंबिका सोनी और पवन बंसल को केंद्रीय मंत्रीमंडल में लिए जाने को लेकर। सोनिया गांधी दोनों को केंद्रीय मंत्रीमंडल में लिए जाने के विरोध में थी। लेकिन प्रधानमंत्री ने मौके पर दोनों का नाम अपनी तरफ से डलवा दिया। दोनों मंत्रियों के बिजनेस साझीदारी को लेकर सोनिया गांधी के पास शिकायत थी और सोनिया गांधी ने इन शिकायतों को काफी गंभीरता से लिया था। लेकिन मनमोहन सिंह ने दोनों को अपने साथ रखा। दूसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर पद हासिल करने के बाद मनमोहन सिंह के व्यवहार में एक और परिवर्तन आया है। ये परिवर्तन यह है कि वे दस जनपथ में हाजिरी लगाना या हर फैसले पर सोनिया गांधी से सलाह लेना छोड़ चुके है। जबकि पिछले कार्यकाल में वे हर फैसले से पहले सोनिया गांधी की सहमति लेते थे। ये एक गंभीर व्यवहार परिवर्तन है।
यह तय है कि मनमोहन सिंह ने अपना एक ग्रुप कांग्रेस में बनाया है। इस ग्रुप में अंबिका सोनी या पवन बंसल ही नहीं है, बल्कि कई और लोग है। बहुत ही चालाकी से मनमोहन सिंह ने अपने खास लोगों को कई पदों से नवाजा है। साथ ही एक कम्युनिटी विशेष के लोगों को महत्वपूर्ण पदों से भी नवाजा है। यह कम्युनिटी विशेष उनकी ही खत्री सिख बिरादरी है। उन्होंने अपनी बिरादरी से दो गर्वनर लगा दिया। इकबाल सिंह को पांडिचेरी का गर्वनर लगाया तो पूर्व आर्मी चीफ जेजे सिंह को नार्थ इस्ट में गर्वनर लगा दिया। साथ ही मोटेंक सिंह को भी महत्वपूर्ण पद देकर अपनी पकड़ वे बनाए हुए है। पर सबसे विवादास्पद फैसला हाल ही में संत सिंह चटवाल को लेकर मनमोहन सिंह ने लिया है। संत सिंह चटवाल भी मनमोहन सिंह की तरह ही पाकिस्तान के रावलपिंडी से आए है और मनमोहन सिंह की बिरादरी से संबंधित है। यही नहीं वे अमेरिकी प्रशासन के भी नजदीक है। सारा देश संत सिंह चटवाल को फ्राड के तौर पर जानता रहा है। उनपर भारत में सीबीआई ने मामला दर्ज किया है और बैंको के लिए कर्ज संत सिंह चटवाल ने नहीं लौटाए है। इसके बावजूद मनमोहन सिंह ने उन्हें पदमश्री दिलवाया।
यह तय है कि मनमोहन सिंह आने वाले दिनों में सोनिया गांधी की परेशानी और बढ़ाएंगे। ये ठीक सीताराम केसरी की तरह ही व्यवहार करेंगे। सीताराम केसरी ने नरसिम्हाराव से इसी तरह का व्यवहार किया था। हालांकि सोनिया गांधी नरसिम्हा राव नहीं है। वे एक मजबूत है और नेहरू परिवार की वारिस है। पर यहां पर खतरा और है। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की पसंद बेशक न हो पर अमेरिका की पसंद है। भारत जैसे देश में मनमोहन सिंह जैसे लोगों को प्रधानमंत्री बनाए रखना अमेरिकी प्रशासन अपने हितों के लिए ज्यादा उचित समझता है। पिछले छ सालों के कार्यकाल मे मनमोहन सिंह ने अमेरिकी हितों में कई कदम उठाए। तभी अमेरिकी इशारे पर पार्टी लाइन से अलग हटकर पाकिस्तान से बातचीत शुरू की। हालांकि यह बातचीत गलत है और शांति की बातचीत है। पर शांति अगर अमेरिका के इशारे पर बहाल हो तो यह भारत के हित में नहीं है। बीटी बैंगन को लेकर मनमोहन सिंह जयराम रमेश को किनारे लगा चुके है। जयराम रमेश सोनिया गांधी के नजदीक है। पर मनमोहन सिंह उन्हें पसंद नहीं कर रहे है। पर समस्या आने वाले दिनों में कुछ और कारणों से गंभीर होगी।
राहुल गांधी सारे संगठनात्मक कामों से अगले साल के मध्य तक मुक्त हो जाएंगे। उनकी एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस का गठन तबतक हो जाएगा और उनकी टीम तैयार हो जाएगी। पर इसके बाद राहुल गांधी क्या करेंगे। इस पर गंभीर विचार कांग्रेस में शुरू हो गया है। वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीम में काम नहीं करेंगे यह तय है। वे अपने हिसाब से टीम तैयार कर रहे है। फिर राहुल गांधी के पास तो एक ही विकल्प रहेगा। वो विकल्प होगा प्रधानमंत्री का पद। इसके लिए मनमोहन सिंह को 2011 में प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतारना होगा। क्या इसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तैयार हो जाएंगे। फिर उस समय अमेरिका क्या चाहेगा यह भी देखना होगा। क्योंकि अब तो हमारे देश में प्रधानमंत्री कौन होगा इसके फैसले में अमेरिका की भूमिका भी तो महत्वपूर्ण होती है। और तो और मंत्रीमंडल में कौन होगा इसका फैसला भी अमेरिका ही लेता है। नटवर सिंह की छुट्टी इसका उदाहरण है।
राहुल गांधी की एक और परेशानी है। झारखंड चुनाव में कांग्रेस को खास सफलता नहीं मिली। अब बिहार चुनाव होना है। बिहार चुनाव में अगर कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सफलता नहीं मिली तो राहुल गांधी की सारी चमक फीकी पड़ जाएगी। इसलिए कांग्रेस में गांधी नेहरू परिवार के भक्त यह नहीं चाहते कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए 2014 का इंतजार किया जाए। उनकी यही इच्छा है कि जल्द से जल्द राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए ताकि 2014 का चुनाव राहुल गांधी की उपल्बिधयों पर लड़ा जाए। पर क्या सरदार मनमोहन सिंह यह होने देंगे। यह तो समय ही बताएगा।

80 करोड ग्रामीणों का जीवन दाव पर!

वास्तव में इस देश का बण्टाधार करने वाले हैं, इस देश के बडे बाबू जो स्वयं को महामानव समझते हैं और इससे भी बडी और शर्मनाक बात यह है कि इस देश का मानसिक रूप से दिवालिया राजनैतिक नेतृत्व इन बडे बाबुओं की बैसाखी के सहारे ही अपनी राजनीति कर रहा है। ये बडे बाबू कभी नहीं चाहेंगे कि ग्रामीणों को भी इंसान समझा जावे। यहाँ विचारणीय बात यह भी है कि ये बडे बाबू क्यों नहीं चाहते कि शहरी क्षेत्र के डॉक्टर गॉवों में सेवा करें? इसकी बडी वजह यह है कि इन बडे बाबुओं के पास काले धन की तो कोई कमी है नहीं, लेकिन केवल इस धन के बल पर ये बडे बाबू और इनके आका राजनेता अपनी सन्तानों को बडे बाबू की जाति में तो आसानी से शामिल नहीं करा सकते हैं। लेकिन देश में अनेक ऐसे मैडीकल कॉलेजों को इन्हीं बडे बाबुओं की मेहरबानी से पूर्ण मान्यता मिली हुई है, जो धनकुबेर बडे बाबुओं, राजनेताओं और उद्योगपतियों की निकम्मी और बिगडी हुई सन्तानों को मनचाहा डोनेशन लेकर डॉक्टर बनाने का कारखाना सिद्ध हो रहे हैं। इन मैडीकल कारखानों से पास होकर निकलने वाले डॉक्टर निजी प्रेक्टिस में तो सफल हो नहीं सकते। अतः उनको सरकारी क्षेत्र में ले-देकर डॉक्टर बनना दिया जाता है और इन शहरी जीवों को डॉक्टरी करने के लिये कभी भी ग्रामीण क्षेत्रों की घूल नहीं फांकनी पडे इस बात का पक्का इलाज करने के लिये आधे-अधूरे ज्ञान वाले ग्रामीण डॉक्टर बनाकर ग्रामीण क्षेत्र में ही नियुक्त करवाने का घिनौना और विकृत विचार राजनैतिक नेतृत्व के माध्यम से इस देश पर लादा जा रहा है।
female doctor 199x300 80 करोड ग्रामीणों का जीवन दाव पर!संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के मूल अधिकार का उल्लेख किया गया है। जिसकी व्याख्या करते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत अर्थात्‌ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुच्छेद 21 में प्रदान किये गये जीवन के मूल अधिकार का तात्पर्य केवल जीने का अधिकार नहीं है, बल्कि इसमें सम्मानपूर्व जीवन जीने का मूल अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट का इससे आगे यह भी कहना है कि कोई भी व्यक्ति बिना पर्याप्त और समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं के तो स्वस्थ रह सकता है और न हीं वह सम्मान पूर्वक जिन्दा ही रह सकता है। अतः सरकार का दायित्व है कि प्रत्येक देशवासी को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाये, जिनमें सभी प्रकार की जाँच और उपचार भी शामिल है। सर्वोच्च अदालत का यहाँ तक कहना है कि जिन लोगों के पास उपचार या चिकित्सकीय परीक्षणों पर खर्चा करने के लिये आर्थिक संसाधन नहीं हैं, उनके लिये ये सब सुविधाएँ मुफ्त में उपलब्ध करवाई जानी चाहिये। ताकि कोई व्यक्ति बीमारी के कारण बेमौत नहीं मारा जाये। अन्यथा संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के मूल अधिकार का कोई अर्थ नहीं होगा।
जबकि इसके ठीक विपरीत ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली सत्तर प्रतिशत आबादी के लिये स्थापित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर या तो डॉक्टर पदस्थ नहीं है या पदस्थ रहकर भी अपनी सेवा नहीं दे रहे हैं। भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के समक्ष आजादी के प्रारम्भ से ही यह समस्या रही है कि शहरों में पला, बढा और पढा व्यक्ति डॉक्टर बनने के बाद गाँवों में लोगों को अपनी सेवाएँ देने में आनाकानी करता रहा है। जिसे साफ शब्दों में कहें तो ग्रामीणों की चिकित्सा सेवा करने के बजाय डॉक्टर शहरों में रहकर के अपनी निजी प्रेक्टिस करने में अधिक व्यस्त रहते हैं। इस मनमानी को कडाई से रोकने के बजाय केन्द्र सरकार ने डॉक्टरों के सामने दण्डवत होकर घुटने टेकते हुए बचकाना निर्णय लिया है कि ग्रामीणों का उपचार करने के लिये ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को ही गाँव में डॉक्टर बना दिया जाये, जिससे कि शहरी डॉक्टरों को गाँवों में तकलीफ नहीं झेलनी पडे। सरकार चाहती है कि गाँव के व्यक्ति को गाँव में ही नौकरी मिल जाये और इस सबसे गाँव के लोगों को हमेशा अपने गाँव में डॉक्टरों की उपलब्धता रहेगी। इसके लिये केन्द्र सरकार बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ केयर (बीआरएच) कोर्स शुरू करने जा रही है।
पहली नजर में भारत सरकार का उक्त निर्णय कितना पवित्र और निर्दोष नजर आता है, लेकिन इसके पीछे के निहितार्थ दूरगामी दुष्प्रभाव डालने वाले हैं। जिन पर विचार किये बिना ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति तक ने इस विचार को मान्यता दे दी है। जिसे केन्द्र सरकार शीघ्रता से लागू करने जा रही है।
जबकि ग्रामीण डॉक्टर बनाने की उपरोक्त विकृत योजना न मात्र देश के 80 करोड ग्रामीणों के जीवन और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड और भेदभाव करने वाली ही है, बल्कि इसके साथ-साथ यह योजना पूरी तरह से असंवैधानिक भी है। इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र के 12वीं पास विद्यार्थियों को चयनित करके 3 वर्ष में डॉक्टर बनाया जायेगा। ऐसे लोग डॉक्टर तो होंगे, लेकिन उन्हें अपनी डॉक्टरी ज्ञान का उपयोग केवल गाँव में ही करना होगा। शहर में जाते ही कानून की नजर में उनका डॉक्टरी ज्ञान अवैधानिक हो जायेगा। अर्थात्‌ इस योजना के तहत डॉक्टर बनने वाला व्यक्ति जीवनपर्यन्त शहर में रहकर डॉक्टरी करने का ख्वाब नहीं देख सकेगा और गाँव में रहने वाला व्यक्ति अपने गाँव में रहते हुए किसी बडे शहर के, बडे अस्पताल में इलाज करने का लम्बा अनुभव रखने वाले शहरी डॉक्टर से उपचार करवाने का सपना नहीं देख सकेगा।
कितने दुःख और आश्चर्य की बात है कि एक ओर तो संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि देश के सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान समझा जायेगा और साथ ही साथ सभी लोगों को कानून का समान संरक्षण भी प्रदान किया जायेगा। जबकि इस तीन वर्षीय पाठ्यक्रम के तहत ग्रामीण डॉक्टर की डिग्री करने वाले डॉक्टर को, शहरी क्षेत्र के डिग्रीधारी डॉक्टरों की तरह स्नातक स्तर की अन्यत्र कहीं भी पात्रता नहीं होगी। सरकारी नौकरी नहीं मिलने पर या ऐसे ग्रामीण डॉक्टर को सरकारी नौकरी छोडने पर, शहर में प्रेक्टिस करने का कानूनी अधिकार भी नहीं होगा।
इस सबके उपरान्त भी ग्रामीण डॉक्टर की प्रस्तावित डिग्री में प्रवेश पाने वालों में भी कडी प्रतियोगिता होना तय है, क्योंकि सर्व-प्रथम तो इस देश में बेरोजगारी एक बडी समस्या है। दूसरे इस देश के युवा वर्ग में सरकारी नौकरी के प्रति कभी न मिटने वाला सम्मोहन है। तीसरे वातानुकूलित कक्षों में बैठकर भारत सरकार के लिये नीति बनाने वाले बडे बाबू ग्रामीण लोगों को इंसान कब समझते हैं। उनकी नजर में ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो शुरू से ही दूसरे दर्जे के नागरिक रहे हैं। इसलिये ग्रामीणों के जीवन को ग्रामीण डॉक्टरों के माध्यम से प्रयोगशाला बनाने में इन कागजी नीति-नियन्ताओं का क्या बिगडने वाला है?
भारत सरकार बिना नौकरी की गारण्टी दिये, इन डॉक्टरों से किसी भी शहर में जाकर प्रेक्टिस करने का हक कैसे छीन सकती है? यही नहीं ग्रामीण डॉक्टर की डिग्री करने वाले लोगों को स्नातक होकर भी आईएएस या अन्य ऐसी कोई भी परीक्षा में बैठने का कानूनी हक नहीं होगा, जो प्रत्येक ग्रेज्युएट को होता है।
इस निर्णय से साफ तौर पर यह प्रमाणित हो रहा है कि भारत सरकार समस्या का स्थाई समाधान ढूंढ़ने के बजाय उसका तात्कालिक समाधान ढूंढ़ रही है, जिससे अनेक नई समस्याएँ पैदा होना स्वाभाविक है। यदि कल को अध्यापक, ग्राम सेवक, कृषि वैज्ञानिक, थानेदार, कोई भी कह देंगे कि वे भी असुविधापूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में क्यों नौकरी करें, तो सरकार के पास कौनसा जवाब होगा। आगे चलकर इससे शहर बनाम ग्रामीण में देश का विभाजन होना तय है। देश में आपसी वैमनस्यता का वातावरण भी निर्मित होगा। जबकि होना तो यह चाहिये कि प्रत्येक लोक सेवक को लोक सेवा के लिये हर हाल में और हर स्थान पर तत्पर रहना चाहिये और जो उसके लिये तैयार नहीं हों, उन्हें लोक सेवा में बने रहने का कोई हक नहीं। ऐसे लोगों को लोक सेवा से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाना चाहिये। फिर देखिये कितने लोग ग्रामीण क्षेत्र में जनता की सेवा से मुःह चुराते हैं।
सचाई कुछ और ही है। वास्तव में इस देश को बण्टाधार करने वाले है, इस देश के बडे बाबू जो स्वयं को महामानव समझते हैं और इससे भी बडी और शर्मनाक बात यह है कि इस देश का मानसिक रूप से दिवालिया राजनैतिक नेतृत्व इन बडे बाबुओं की बैसाखी के सहारे ही अपनी राजनीति कर रहा है। ये बडे बाबू कभी नहीं चाहेंगे कि ग्रामीणों को भी इंसान समझा जावे। यहाँ विचारणीय बात यह भी है कि ये बडे बाबू क्यों नहीं चाहते कि शहरी क्षेत्र के डॉक्टर गाँवों में सेवा करें? इसकी बडी वजह यह है कि इन बडे बाबुओं के पास काले धन की तो कोई कमी है नहीं, लेकिन केवल इस धन के बल पर ये बडे बाबू और इनके आका राजनेता अपनी सन्तानों को बडे बाबू की जाति में तो आसानी से शामिल नहीं करा सकते हैं। लेकिन देश में अनेक ऐसे मैडीकल कॉलेजों को इन्हीं बडे बाबुओं की मेहरबानी से पूर्ण मान्यता मिली हुई है, जो धनकुबेर बडे बाबुओं, राजनेताओं और उोगपतियों की निकम्मी और बिगडी हुई सन्तानों को मनचाहा डोनेशन लेकर डॉक्टर बनाने का कारखाना सिद्ध हो रहे हैं। इन मैडीकल कारखानों से पास होकर निकलने वाले डॉक्टर निजी प्रेक्टिस में तो सफल हो नहीं सकते। अतः उनको सरकारी क्षेत्र में ले-देकर डॉक्टर बनवा दिया जाता है और इन शहरी जीवों को डॉक्टरी करने के लिये कभी भी ग्रामीण क्षेत्रों की घूल नहीं फांकनी पडे इस बात का पक्का इलाज करने के लिये आधे-अधूरे ज्ञान वाले ग्रामीण डॉक्टर बनाकर ग्रामीण क्षेत्र में ही नियुक्त करवाने का घिनौना और विकृत विचार राजनैतिक नेतृत्व के माध्यम से इस देश पर लादा जा रहा है।
उपरोक्त निर्णय से यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि बडे बाबुओं की नजर से दुनियां को देखने के आदि इस देश के राजनैतिक नेतृत्व की नजर में शहरों में रहने वालों का जीवन इतना महत्वपूर्ण है कि उन्हें गाँवों में रहने वाले आलतू-फालतू लोगों की सेवा के लिये, गाँवों में क्यों पदस्थ किया जाये? यदि आधुनिक सुख-सुविधाओं में जीवन जीने के आदि हो चुके शहरी लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में नियुक्त किया गया तो ऐसा करना तो उनके खिलाफ क्रूरता होगी! जबकि गाँव में रहने वाले के मुःह में तो जवान होती ही नहीं। इसलिये उसका जैसे चाहे शोषण, तिरस्कार और अपमान किया जा सकता है। तब ही तो उक्त बैचलर ऑफ रुरल हेल्थ केयर (बीआरएच) कोर्स में प्रवेश के समय ही ग्रामीण क्षेत्र में रहकर सेवा करने की बाध्यकारी और असंवैधानिक शर्त थोपी जाने का प्रस्ताव है।
इसके विपरीत देश के धन से संचालित बडे-बडे शिक्षण संस्थानों में अध्ययन करने वाले अन्य सभी विद्यार्थियों को प्रवेश देने से पूर्व क्या भारत सरकार ऐसा नियम बना सकती है कि उनको आवश्यक रूप से देश में रहकर ही अपनी सेवाएँ देनी होंगी और वे विदेश में जाकर नौकरी नहीं करेंगे। या यदि विदेश में जायेंगे तो उनकी डिग्री अमान्य होगी। सरकार ऐसा कभी नहीं कर सकती! लेकिन क्यों? इस सवाल का उत्तर देश के उन करोडों लोगों को चाहिये, जिन्हें संविधान, देश सेवा और समानता की भावना में आस्था है!

लोकतंत्र में निर्जन एकांत नहीं होता मकबूल फिदा हुसैन

एफ एम हुसैन साहब बहुत बड़े चित्रकार हैं,भारतीय चित्रकला परंपरा में उनका गौरवपूर्ण स्थान है। भारतीय कला के उन्होंने अनेक नए मानक बनाए और तोड़े है। उनकी कला में भारत की आत्मा निवास करती है। कलाकार के रंगों के साथ उसके देश का अभिन्न संबंध होता है। उनकी कला का धर्मनिरपेक्ष आयाम भारतीय कलाकारों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों को आलोड़ित करता रहा है।
हुसैन साहब कई सालों से स्वेच्छा से विदेश में थे, यह सच है कि संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने उनके खिलाफ जेहाद छेड़ा हुआ है,नियोजित ढ़ंग से उनके खिलाफ मुकदमे दायर किए गए हैं। उनके चित्रों की प्रदर्शनियों पर संघ परिवार हमले करता रहा है। इस सबके खिलाफ देश के चित्रकारों और संस्कृतिकर्मियों ने उनका खुलकर साथ दिया है। इसके बावजूद संघ के हमले थमे नहीं हैं और हुसैन साहब विदेश चले गए और कई सालों से वहीं रह रहे हैं।
आज अखबार से पता चला कि उन्होंने भारत छोड़ने का फैसला ले लिया है। हुसैन साहब विश्व में कहां रहें यह उनका फैसला होगा,लेकिन भारत पर लांछन लगाकर कतार जाना सही नहीं है।
हुसैन साहब की मुश्किल यह है कि वे अपने लिए निर्जन एकांत खोज रहे हैं। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र की धुरी शांति नहीं लाठी है। लोकतंत्र में जनतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल वही कर सकता है जो जूझने में सक्षम हो, लोकतंत्र में अधिकारों के इस्तेमाल की शक्ति उसी के पास है जो अपने हक बचा सकता हो,लोकतंत्र में हक स्वत:नहीं मिलते उन्हें अर्जित करना होता है। संघर्ष करके अर्जित करना होता है। लोकतांत्रिक हक सत्ता की कृपा से नहीं मिलते व्यक्ति के निजी संघर्ष से मिलते हैं। हुसैन साहब चाहते हैं कि उनके खिलाफ कोई कुछ न बोले, संघ भी न बोले। सरकार उन्हें संरक्षण दे। शैतान गायब हो जाएं और वे शांति से चित्र बनाएं,आराम से घूमें फिरें,चूँकि यह सब भारत में नहीं है अत: बतर्ज हुसैन साहब भारत ने उन्हें भगा दिया।
हुसैन साहब की निर्जन एकांत की आशा का भारत के प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में पूर्ण होना संभव नहीं है। हुसैन साहब जानते हैं कि कतार में भारत जैसा लोकतंत्र नहीं है और वहां पर मानवाधिकारों का वैसे पालन भी नहीं किया जाता जैसा भारत में होता है। भारत जैसी स्वतंत्र और पेशेवर न्यायपालिका भी कतार में नहीं है। हां ,वहां के राजा के पास बेशुमार दौलत है और वे अपने किसी भी अतिथि को कुछ भी दे सकते हैं। खासकर हुसैन जैसे महान कलाकार को तो कुछ भी दिया जा सकता है।
हुसैन महान है उसका दुख भी महान है। उसकी शांति भी महान है। लेकिन इन सबसे महान भारत का लोकतंत्र है। लोकतंत्र में अधिकार समाज और व्यक्ति के हैं तो कष्ट भी समाज और व्यक्ति के साझा हैं। लोकतंत्र में साझा नियति को भोगना अनिवार्य है।
हुसैन साहब ने अपने दुख ,उत्पीड़न और अपमान को लोकतंत्र के साझा दुख और अपमान से बड़ा करके और निहित स्वार्थीभाव से देखा है और अपने व्यक्तिगत सुख और शांति को पाने के लिए लोकतंत्र को तिलांजलि दे दी। धिक्कार है ऐसी खुदगर्जी को।
हुसैन साहब भारत में संघ परिवार के बंदे सिर्फ आपको ही परेशान नहीं कर रहे उनसे सारा देश परेशान है,ऐसी अवस्था में क्या समूचे भारत को कतार भेज दें ? क्या साम्प्रदायिक और आतंकी ताकतों से जंग का यही रास्ता बचा है कि बिस्तर बाँधकर विदेश चले जाएं ? क्या आपने एकबार भी नहीं सोचा कि आजादी के दौर में विदेश से भारतीय आते थे देश को आजाद कराने के लिए , इनमें सैंकड़ों ऐसे बेहतरीन इंसान थे जिन्होंने अपना शानदार कैरियर देश को आजादी दिलाने के लिए त्याग दिया। हुसैन साहब जानते हैं महात्मा गाँधी का कैरियर आपसे कम नहीं था। मैं ऐसे सैंकड़ों महान हस्तियों का जिक्र कर सकता हूँ जो शांति के लिए देश छोड़कर नहीं गए।
हुसैन साहब आप आम लोगों को निजी शांति के नाम पर खतरनाक संदेश दे रहे हैं। निज की शांति के लिए लोकतांत्रिक देश त्यागो, विकल्प के रुप में चाहे किसी राजतंत्र या सर्वसत्तावादी तंत्र की शरण ले लो। कलाकार का इस तरह खुदगर्ज होना पतन का संकेत है। लेखक-कलाकार -बुद्धिजीवी अपने लिए नहीं दूसरों के लिए,लोकतंत्र के लिए जीता है । उसे दूसरों ने,समाज ने बनाया होता है।
आपकी महानता निजी करामात की पैदाइश नहीं है आप पर इस देश का बहुत कुछ खर्च हुआ है और वह हमें सूद सहित आपसे वापस चाहिए। भारत की माटी का कर्ज आप पर है उसे चुकाने के लिए आपके रंग भी कम पड़ जाएंगे, कतार के शासन को यदि एम एफ हुसैन चाहिए तो अब तक जो कुछ हुसैन को बनाने पर खर्च हुआ है वह हमें कतार के शासक लौटाएं ? हुसैन साहब आपका जैसा महान कलाकार भारत में ही तैयार हो सकता है कतार में नहीं । यदि कोई वैसा कलाकार कतार में होता तो आप कतार में न होते।
हुसैन साहब आपका हिन्दू कठमुल्लों के डर से भागकर देश त्याग देना किसी भी तर्क से गले नहीं उतर रहा। आप महान हैं वैसे ही आपका भारत को त्यागना भी 21वीं सदी सबसे बड़ी बेवकूफी है। अक्लमंद लोग लोकतंत्र में मरते हैं, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए कुर्बानियां देते हैं। अपने निजी स्वार्थ को लोकतंत्र के स्वार्थ के मातहत रखते हैं। लोकतंत्र में दुख के साथ जीने में भी सुख है। लोकतंत्रविहीन देश में सुख के साथ जीना नरक में जीने के बराबर है। हुसैन साहब लोकतंत्र में हारकर भी मैदान नहीं छोड़ा जाता। आपने मैदान छोड़कर लोकतंत्र के रणछोर की सूची में अपना नाम लिखा लिया है।

बेपर्दा सन्त-महात्मा कितना सच!

भारत जैसे देश में जहाँ कृष्ण जैसे महान व्यक्तित्व ने सभी क्षेत्रों में सच्चाई को स्वीकार करके एक से एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वहाँ हम क्यों चाहते हैं कि सन्त या महापुरुष मुखौटे धारण करके अप्राकृतिक जीवन जियें? सेक्स या सम्भोग एक अति सामान्य और स्वाभाविक क्रिया होने के साथ-साथ प्रत्येक जीव के लिये अपरिहार्य भी है, जिसे रोकना या दमित करना अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियों और विकृतियों को जन्म देता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे कभी भी रोकना नहीं है, बल्कि हर हाल में इसकी जरूरत को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा। तब ही हम सच्चे महापुरुषों एवं सन्तों को फलते-फूलते देख सकते हैं। अन्यथा हमें अपने आपको आये दिन ऐसे यौनाचारी तथा पाखण्डी साधु-सन्तों और महापुरुषों या राजनेताओं के हाथों अपनी भावनाओं को आहत होते रहने देने के लिये सदैव तैयार रखना चाहिये।
ndtiwari 350x214 बेपर्दा सन्त महात्मा कितना सच!गत वर्ष 28 दिसम्बर को काँग्रेस के वयोवृद्ध (85 वर्षीय) नेता एवं आन्धप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी को कथित रूप से तीन युवतियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखे जाने के बाद, अपने पद से त्यागपत्र देना पडा। इससे पूर्व एक युवक ने तिवारी पर अदालत में याचिका दायर करके आरोप लगया था कि वह नारायण दत्त तिवारी का पुत्र है और उसने अदालत से तिवारी का एवं अपना डीएनए टेस्ट करवाने की गुहार भी लगाई थी। यह अलग बात है कि बडे लोगों के मामले में अदालत भी दोहरे मानदण्ड अपनाती देखी जा रही है। जिसका जीता जागता प्रमाण है कि आज तक तिवारी का डीएनए टेस्ट करवाने की अनुमति नहीं मिल पाना। अनेक और भी मामले हैं, जिनमें बडे लोगों के प्रति अदालतों को नरम या भिन्न रुख अपनाते देखा जा सकता है।
कुछ वर्ष पूर्व गुजरात में जैन सन्त सेक्स स्केण्डल में लिप्त पाये गये थे। गुजरात से ही ताल्लुक रखने वाले सन्त आशाराम एवं उनके पुत्र नारायण सांई पर भी अनेक बार आपत्तिजनक आरोप लग चुके हैं। दिल्ली में इच्छाधारी सन्त को सेक्स रैकेट में पकडे जाने की खबर अभी ठण्डी भी नहीं हुई थी कि कर्नाटक के स्थानीय समाचार चैनलों ने परमहंस नित्यानंद के दो महिलाओं के साथ अश्लील कृत्य में शामिल होने का वीडियो फुटेज जारी कर दिया। जिससे परमहंस नित्यानंद के विरुद्ध स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पडा और लोग सडकों पर उतर आये एवं नित्यानन्द की तस्वीर को जूतों से पीटते हुए अनेक हिन्दी चैनलों पर भी दिखाये गये। परमहंस नित्यानंद का वह आश्रम जहाँ पर वे लोगों को प्रवचन दिया करते थे, 29 एकड के क्षेत्र में फै ला हुआ है। जिससे उनके बडे और धनाढ्य सन्त होने का प्रमाण स्वतः ही मिल जाता है। आश्रम के एक प्रवक्ता ने कहा कि परमहंस नित्यानंद के खिलाफ साजिश रची गई है। कुछ वर्षों इसी प्रकार के आरोपों वाला एक आलेख पूर्ण पुट्टपर्ती के साई बाबा पर भी देश की प्रतिष्ठित पत्रिका इण्डिया टुडे ने प्रकाशित किया था। परन्तु बात आई-गयी हो गयी। मामला दब गया और जनता भूल गयी। उस समय मुरली मनोहर जोशी देश के मानव संसाधन मन्त्री थे और वे साई बाबा के भक्त रहे हैं।
उपरोक्त कुछ मामले तो इस आलेख के प्रारम्भ में भूमिका के रूप में दिये गये हैं। अन्यथा इस प्रकार के अनेकों अदाहरण हर गाँव, शहर और कस्बे में मिल जायेंगें। इतिहास उठाकर देखें तो हर कालखण्ड में ऐसे अनेकों मामले होते रहे हैं। हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय में कमोबेश इस प्रकार की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। भारत में ही नहीं हर देश में इस प्रकार के मामले देखे जा सकते हैं। चूंकि पूर्व में इस प्रकार की घटनाएँ खबर नहीं बन पाती थी। इसलिये लोगों को पता नहीं चल पता था, लेकिन इन दिनों मीडिया में गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। इसलिये चैनल और समाचार-पत्र अपनी दर्शक एवं पाठक संख्या में वृद्धि करने के लिये आजकल तो ऐसे हालातों को पूर्व नियोजित तरीके से घटनाओं में परिवर्तित करके खबरें बना कर बेच रहे हैं।
ऐसे हालात में जनता की ओर से हंगामा करने और देश तथा जनता की सम्पत्ति को नुकसाने पहुँचाने वाली भीड को उकसाने के लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। मीडिया के लोगों में भी ऐसे मामले ढेरों मामले हैं, लेकिन बिना मीडिया के सहयोग के उन्हें उजागर करना किसी के लिये सम्भव नहीं है। पिछले दिनों मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि अपने आपको राष्ट्रीय चैनल कहने वाले दिल्ली (नोएडा) के एक चैनल में युवा और सुन्दर दिखने वाली लडकियों को आऊट ऑफ टर्न (बिना बारी के) पदोन्नति देना आम बात है और एक-दो बर्ष बाद ही उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाता है।
इस सन्दर्भ में, मैं कहना चाहता हूँ कि यदि हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखेंगे तो पायेंगे कि ऋषी-मुनियों के काल से लेकर आधुनिक काल के सन्तों तक कोई भी काल खण्ड ऐसा नहीं रहा, जिसे कि हम यौनाचार से मुक्त काल कह सकें। आदि काल में केवल पुरुष यौनाचार करने या इसे बढावा देने के लिये जिम्मेदार माना जाता रहा था, जबकि आज के समय में स्त्री ने उस पर पुरुषों द्वारा थोपी गयी लक्ष्मण रेखा को लांघना शुरू कर दिया है।
swami narayan sex 350x253 बेपर्दा सन्त महात्मा कितना सच!मानव मनोविज्ञान का सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जब भी किसी पर कोई बात जबरन थोपी जाती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से भयंकर होती है। हम आम लोग मानव होकर के भी मानव की स्वाभाविक वृत्तियों को भुलाकर ईश्वर की आराधना से जुडे लोगों, जिन्हें हम सन्त-महात्मा कहते हैं से अपेक्षा करने लग जाते हैं कि ईश्वर की भक्ति का रस चखने वाला व्यक्ति अन्य बातों के अलावा काम से तो पूरी तरह से मुक्त होना चाहिये, जबकि सच में ऐसा न तो कभी हुआ है और न हीं वर्तमान में और न हीं ऐसा सम्भव है। कुछ कपोल कल्पित कहानियों को छोड दिया जाये तो स्वयं हमारे भगवान भी काम से मुक्त नहीं रहे हैं तो फिर भगवान के भक्तों से काम से मुक्त रहने की अपेक्षा करना उनके साथ ज्यादती के सिवा कुछ भी नहीं है।
गाईड फिल्म के हीरो की तरह कोई बात जब किसी पर थोप दी जाती है तो उस व्यक्ति की मजबूरी हो जाती है कि वह जनता द्वारा गढी गयी छवि के अनुरूप आचरण करने का प्रयास करे। जबकि उसके अन्दर बैठा मानव तो आम मानव जैसे सभी कार्य करने को छटपटाता रहता है। हम ऐसे कथित या वास्तविक सन्तों से आम मानवीय आचरण करने की अपेक्षा नहीं करना चाहते। इसी का परिणाम है कि उन्हें मुखौटा लगाकर जीने को विवश होना पडता है। जैसे ही मुखौटे से पर्दा हटता है, हम ऐसे व्यक्ति के फोटो पर जूतों की माला पहनाने लगते हैं।
इसके पीछे भी हमारा एक मनोविज्ञान है। हमें इस बात का उतना दुःख नहीं होता कि सन्त महाराज ऐसा यौनाचार क्यों कर रहे हैं, बल्कि दुःख इस बात का होता है कि सन्त की जो छवि हमने गढी वह टूट क्यों गयी। हमने धोखा क्यों खाया? अब हम किसके समक्ष अपने पापों का पायश्चित करेंगे? हम लोगों के समक्ष किस प्रकार से कह सकेंगे कि हम यौनाचारी सन्त के भक्त रहे हैं? यही नहीं, बल्कि कुछ भक्तों को तो ऐसे मामले उजागर होने पर इस बात के कारण भी गुस्सा आता है कि जिस यौनानन्द से वे स्वयं वंचित हैं और जिन यौनानन्दों को त्यागने के लिये सन्त जी प्रवचन देते रहे, वे स्वयं उनका पूर्णानन्द लेते रहे?
इस सम्बन्ध में एक बात पाठकों की अदालत में रखना जरूरी समझता हँू, बल्कि एक सवाल उठाना चाहता हूँ कि भक्तगण क्या इस बात से परिचित नहीं हैं कि जब वे सन्तों के प्रवचन सुनने जाते हैं तो दान पेटी में जो भी धन अनुदान करते हैं, वह सन्त जी जेब में जाता है। इस धन को दान करने के पीछे भक्तों का विचार नेक हो सकता है, लेकिन इस धन के उपयोग के बारे में भी तो भक्तों और अनुयाईयों को विचार करना चाहिये। मुझे याद है कि दस वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के एक शहर में एक सन्त जब भी सात दिन के लिये प्रवचन देने आते थे तो आयोजक उन्हें दस लाख रुपये का अग्रिम भुगतान किया करते थे। जिसके बदले में दान पेटी से आने वाला धन तथा एकत्रित किये जाने वाले चन्दे पर कार्यक्रम आयोजकों का पूर्ण अधिकार होता था। इस प्रकार के आयोजनों से आयोजकों को सात दिन में कई लाख की कमाई होती थी। इस प्रकार की बातों के बारे में जानकारी होने के बाद भी भक्तगण दान पेटी में प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य ही डालकर आते हैं।
यदि निष्पक्षता से देखा जाये तो धन और सन्त का कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिये। सच्चे सन्त को तो दो वक्त के भोजन और जरूरी कपडों के अलावा किसी वस्तु की जरूरत होनी ही नहीं चाहिये। लेकिन आज के सन्त तो वातानुकूलित कक्षों में निवास करते हैं और वातानुकूलित वाहनों में ही यात्रा करते हैं। हम स्वयं उन्हें सारी सुख-सुविधाएँ जुटाते हैं, लेकिन इसके विपरीत हम यह भी चाहते हैं कि कंचन (धन-दौलत) के करीब रहकर भी वे कामिनी (काम) से दूर रहें! क्या यह आसान और सम्भव है? ऐसा हो ही नहीं सकता। इसलिये जो-जो भी सन्त यौनाचार के कथित आरोपों में पकडे जा रहे हैं, उनको इस मार्ग को अपनाने के लिये प्रत्यक्षतः भक्त भी उकसाते हैं।
इस सम्बन्ध में यह बात और भी विचारणीय है कि प्रत्येक स्त्री और पुरुष का अनिवार्य रूप से यौन जीवन होता है। जिसे भोगने का उसे जन्मजात और संविधान सम्मत अधिकार होता है। जब हम सन्त और महापुरुषों से अपेक्षा करते हैं कि वे सेक्स से दूर रहें तो हम संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित दैहिक स्वतन्त्रता के मूल अधिकार से सन्तों को वंचित करने का अपराध कर रहे होते हैं। जिसकी प्रतिक्रिया में इन लोगों को मूजबूरन गोपनीय रूप से अपनी यौनेच्छा को तृप्त करना पडता है, जिसमें पकडे जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। फिर भी आज के समय में सन्त होना सबसे सुरक्षित व्यवसाय सिद्ध हो रहा है!
भारत जैसे देश में जहाँ कृष्ण जैसे महान व्यक्तित्व ने सभी क्षेत्रों में सच्चाई को स्वीकार करके एक से एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वहाँ हम क्यों चाहते हैं कि सन्त या महापुरुष मुखौटे धारण करके अप्राकृतिक जीवन जियें? सेक्स या सम्भोग एक अति सामान्य और स्वाभाविक क्रिया होने के साथ-साथ प्रत्येक जीव के लिये अपरिहार्य भी है, जिसे रोकना या दमित करना अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियों और विकृतियों को जन्म देता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे कभी भी रोकना नहीं है, बल्कि हर हाल में इसकी जरूरत को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा। तब ही हम सच्चे महापुरुषों एवं सन्तों को फलते-फूलते देख सकते हैं। अन्यथा हमें अपने आपको आये दिन ऐसे यौनाचारी तथा पाखण्डी साधु-सन्तों और महापुरुषों या राजनेताओं के हाथों अपनी भावनाओं को आहत होते रहने देने के लिये सदैव तैयार रखना चाहिये।
अन्त में एक बात और भी कहना चाहूँगा कि जो-जो भी सन्त या महापुरुष सेक्स स्केण्डल में पकडे जा रहे हैं, जरूरी नहीं कि वे वास्तव में दोषी हों? हो सकता है कि कुछ लोगों या संगठनों ने अपने स्वार्थ साधन के लिये या अपना प्रभाव बढाने के लिये या सन्त का प्रभाव समाप्त करने के लिये ड्रामा रचाकर सेक्स स्केण्डल की रचना कर डाली हो? क्योंकि सन्तों या गुरुओं के मामले में प्रचार पाने का अवसर आसनी से मिल जाता है। इसलिये आम लोगों को हर बात को केवल मीडिया की दृष्टि से पढने, देखने और सुनने की आदत पर विराम लगाकर अपने विवेक का भी इस्तेमाल करना चाहिये।

सेक्स का औद्योगिकीकरण

मौजूदा दौर की विशेषता है सेक्स का औद्योगिकीकरण। आज सेक्स उद्योग है। पोर्न उसका एक महत्वपूर्ण तत्व है। पोर्न एवं उन्नत सूचना तकनीकी के अन्तस्संबंध ने उसे सेक्स उद्योग बना दिया है।
भूमंडलीकरण के कारण नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों के आधार पर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस व्यवस्था में निरंतर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट पर जोर है। उसी के आधार पर रीस्ट्रक्चरिंग हो रही है। इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए जरूरी है कि जनता की स्वीकृति हासिल की जाए।
जनता की सहमति के बगैर यदि रीस्ट्रक्चरिंग की जाती है है तो तनाव पैदा होगा,झगड़े होंगे और अराजकता फैलेगी। इस सबसे निबटने के लिए बल प्रयोग करना होगा। यही वह बिन्दु है जिसे केन्द्र में रखकर नव्य उदारतावादी नीतियों की सारी रणनीति काम कर रही है। अब जोर व्यक्तिवादी विचारधारा पर है।प्रतिस्पर्धी रूपों पर है। व्यवसायिकता पर जोर दिया जा रहा है।ये सारी चीजें मिलकर संरचनात्मक असमानता पैदा कर रही हैं।निरंतर शोषण,गरीबी, हताशा, डेसपरेशन आदि पैदा कर रही हैं। इस स्थिति से ध्यान हटाने के लिए समूचा मनोरंजन उद्योग, इच्छा उद्योग और सेक्स उद्योग सक्रिय है। वह असल मुद्दों या समस्या से ध्यान हटाने या गलत दिशा देने का काम कर रहा है।
नव्य-उदारतावाद सामान्य लोगों को यह बताने में व्यस्त है कि नव्य विश्व व्यवस्था लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है। वह व्यक्ति के उपभोग, व्यक्तिगत चयन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। यह धारणा भी प्रसारित की जा रही है कि माल और व्यक्ति का विनिमय हो सकता है। निजी उद्योग का लक्ष्य सार्वजनिक भलाई करना है। कारपोरेट सक्षमता विकसित करने के लिए वस्तुकरण जरूरी है।
तीसरी दुनिया के देशों में श्रम का नव औपनिवेशीकरण हो रहा है।नस्लवाद और सेक्सवाद को सहज,स्वाभाविक और सहनीय बनाया जा रहा है। नस्लवाद, सेक्सवाद, नव्य उपनिवेशवाद मूलत: नयी विश्व व्यवस्था के एजेण्ट के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक मुक्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय मीडिया एवं सूचना कंपनियों ने इच्छाओं और सहजजात वृत्तियों पर हमला बोला है।इच्छाओं के आधार पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लाभ, कामुक शांति,वेश्यावृत्ति, जिस्म फरोशी तार्किक परिणति के रूप में सामने आई है।
ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है।बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।
कालान्तर में रजवाडों की राजनीतिक हमलावर कार्रवाईयों ने इसे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक गुलाम वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। असल में जो औरतें गुलाम थीं उनसे वेश्यावृत्ति करायी जाती थी। वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। वेश्यावृत्ति के विस्तार ने अन्य व्यक्ति के लिए संपदा और सामाजिक
हैसियत की सृष्टि की।इसी क्रम में बच्चों की बिक्री का मामला भी सामने आया।बच्चों को श्रम के लिए बेचा जाता था।
सामाजिक विकास के क्रम में स्त्री के लिए कानून बनाए गए,उसे सम्मानित नजरिए से देखा जाने लगा। फलत: स्त्री शुचिता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।खासकर बेटी की शुचिता को सम्मानित नजरिए से देखा गया।पवित्र बेटी परिवार की संपत्ति मानी गयी। कालान्तर में वेश्यावृत्ति ने अपना रूपान्तरण किया और मर्द की सामाजिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्त्ति के रूप में अपना विकास किया। इसी क्रम में स्त्रियों के बीच में छोटे-बड़े के भेदभाव ,ऊँच-नीच आदि की केटेगरी का उदय हुआ। स्त्री को नैतिकता आधार पर वर्गीकृत किया गया। ये सारे अंतर स्त्री की कामुक उपलब्धता पर आधारित थे।इसमें सबसे ऊपर विवाहिता को दर्जा दिया गया,इसके बाद शादी लायक पवित्र कन्या ,इन दोनों के बीच उपपत्नी,सबसे नीचे अविवाहित देवदासी और गुलाम औरत को स्थान दिया गया।
वेश्यावृत्ति के पेशे में वे औरतें ठेली गयीं जो शोषित थीं। गुलाम थीं। कामुक संपत्ति थीं। जिनका सामाजिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान होता था। जिन्हें तरह-तरह के काम दिलाने के बहानों से फुसलाया जाता था। सामन्ती दौर में स्त्री के विनिमय या उपहार स्वरूप देने की प्रथा ने स्त्री के शोषण को एक आकर्षक वैध व्यवस्था बनाया।
आधुनिक समाज में पुरूष के अधिकार और स्वतंत्रता की स्थापना हुई। स्त्री को किन्तु ये दोनों अधिकार नहीं मिले। वह पहले की तरह पराधीन बनी रही। इसके कारण वेश्यावृत्ति का एक खास किस्म की सामाजिक रूप से अवैध व्यवस्था के रूप में विकास किया गया।
आधुनिक काल के पहले वेश्यावृत्ति सामाजिक व्यवस्था का वैध हिस्सा थी। किन्तु आधुनिक काल में इसे समाज का अवैध हिस्सा घोषित कर दिया गया। सवाल उठता है कि वेश्यावृत्ति अवैध है तो इसके उन्मूलन के प्रयास क्यों सफल नहीं हुए,पूंजीवादी व्यवस्था ने वेश्यावृत्ति को क्यों बनाए रखा ?
क्या कारण है कि वेश्यावृत्ति खत्म होने की बजाय बढ़ी है। वेश्यावृत्ति के खात्मे का संघर्ष स्त्री मुक्ति के संघर्ष से अभिन्न रूप से जुड़ा है। पूंजीवादी समाज में वेश्यावृत्ति के फलने-फूलने का प्रधान कारण है सामाजिक तौर पर स्त्री का वस्तुकरण , विनिमय के रूप में उसका इस्तेमाल और स्त्री विरोधी भेदभावपूर्ण सामाजिक परिवेश। वेश्यावृत्ति सिर्फ स्त्री हिंसा या पितृसत्ता के
कारण नहीं पैदा हो रही बल्कि उल्लिखित कारण उसके लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा उपनिवेशवाद,सैन्यवाद, भूमंडलीय संरचनाएं वेश्यावृत्ति के नए कारकों में प्रमुख हैं। वेश्यावृत्ति में वे औरतें ज्यादा हैं जो वंचित हैं,हाशिए पर हैं, विस्थापित हैं,श्रम क्षेत्र से निकाल दी गयी हैं।

व्यंग्य/ दाल बंद, मुर्गा शुरु

मैं उनसे पहली दफा बाजार में मदिरालय की परछाई में मिला था तो उन्होंने राम-राम कहते मदिरालय की परछाई से किनारे होने को कहा था। उन दिनों मैं तो परिस्थितियों के चलते शुद्ध वैष्‍णव था ही पर वे सरकारी नौकरी में होने के बाद भी इतने वैष्‍णव! मन उनके दर्शन कर आह्लादित हो उठा था। ये संसार बेकार निस्सार लगने लगा था। दोस्त की घरवाली से लंबी उनकी चोटी, माथे पर दस ग्राम खालिस चंदन का इस छोर से लेकर उस छोर तक लेप। कुरते के ऊपर से चार चार जनेऊ! हाथ में माला। मुंह में राम-राम! बगल में छुरी उस वक्त मुझे नहीं दिखी। उन्हें देखा तो लगा सरकारी दफ्तरों में धर्म अभी भी जैसे ऐसे ही सज्जनों के कारण बचा है। मन किया उनके चरणों की धूलि लेकर माथे पर अपने तो लगा ही लूं अपनी आने वाली संतानों को भी बचा कर रखूं। मन किया कि घर से भगवान का फोटो निकाल उनकी जगह बंदे का फोटो लगा दूं। पर डरा! अगर भगवान नाराज हो गए तो….
भगवान को सरकारी नौकरी दिलाने के लिए उस रोज भी मंदिर गया था सवा रुपये के लड्डू लेकर। बेराजगार बंदा किलो भर लड्डू चढ़ाने से तो रहा। ये काम तो पद का सदुपयोग करने वाले ही कर सकते हैं कि चोरी छिपे चढ़ा आए मंदिर में लाखों रूपए की पोटली और हो गए देश के महान दानी। जैसे ही मैंने रोते हुए भगवान के चरणों में ललचाए मन से वे लड्डू रख मन ही मन्नत की कि अगर अबके मैं सलैक्ट हो गया तो पांच किलो देसी घी में बने लड्डू चढ़ाऊं कि तभी पीछे से किसी ने मेरा कंधा झिंझोड़ा, ‘कौन??’ मैं घुटने टेके पीछे को हुआ तो पीछे खड़े ने कहा, ‘भगवान!’
‘पर भगवान तुम?? मेरे पीछे? मैं तो हमेशा सोचता रहा कि भगवान बंदे के आगे होते हैं।’
‘हां, मैं भगवान! यार! आजकल भक्तों के आगे आने से डर सा लग रहा है। क्यों, कोई शक?? ‘
‘कंगाली में तो गधे पर भी शक नहीं करना पड़ता भले ही वह अपने को घोड़ा कह रहा हो और आप तो भगवान हो।’ कह मैंने दोनों हाथ जोड़ दिए, गिड़गिड़ाया, ‘प्रभु! अबके बस इंटरव्यू में पार लगा दो। बस, फिर आप से कुछ मांगू तो नरक देना। देखो न,ओवरेज हो रहा हूं। षादी की उम्र तो निकल ही गई है। अब तो घरवाले लड़का होने के बाद भी मुझे अपने पर लड़की से अधिक भार समझने लगे हैं। प्रभु! अबकी बार मुझे अपने कंधों पर चढ़ा इंटरव्यू रूपी भवसागर पार करा दो। उसके बाद आप जो कहोगे करूंगा। ‘मैं जितना गिड़गिड़ा सकता था उनके आगे गिड़गिड़ाया तो उन्होंने इधर उधर देखा। उस वक्त पुजारी भी बाहर गया था। चारों ओर से निष्चिंत हो उन्होंने थके मन से कहा, ‘यार! नौकरी किसके चरणों में पड़कर मांग रहे हो? उठो और इस तरह गलत दरवाजे पर झोली फैलाना छोड़ो! ‘फिर अपनेपन से समझाते बोले, ‘सुनो जो सच कह रहा हूं। मेरे यहां आकर समय बरबाद मत करो नहीं तो अबके भी इंटरव्यू में रह जाओगे।’
‘तो किसके द्वारे जाऊं भगवन ! आपने तो बड़ों बड़ों को तारा तो अब मेरी बारी में हाथ खड़े क्यों?साफ क्यों नहीं कहते कि महंगाई के इस दौर में सवा रूपए के लड्डू कोई मायने नहीं रखते। आज आस्था मन से नहीं जेब से जुड़ गई है।’
‘यार उठो! बेकार में अपना और मेरा समय खराब न करो। जो कह रहा हूं ध्यान से सुनो! तुम्हारे ही नहीं तुम्हारे बाल बच्चों के भी काम आएगा जो विवाह हो गया तो। मैं तो आज की डेट में खुद असहाय हो गया हूं। मेरे से पावरफुल तो नेता लोग हैं। उनको पटाओ तो काम बने। मैं खुद उनको पटाने के चक्कर में हूं ताकि मुझे इस जेल से छुटकारा मिले। यहां तो मुझे चौबीसों घंटे धूर्त पुजारी यूज करने में जुटा है। तंग आ गया हूं इस पुजारी से। जब पुजारी कहे उठो। जब तक पुजारी कहे बैठे रहो, चुपचाप बैठे रहना पड़ता है। मेरा अपना अस्तित्व तो जैसे है ही नहीं। इससे बेहतर तो लगता है किसीके यहां बरतन मांज लूं। स्वतंत्रता तो होगी। यहां तो पुजारी का गुलाम बनकर रह गया हूं। इसलिए मेरी मानो तो किसी नेता को पटाओ और अपने ये सवा रूपए के लड्डू उठा भाग लो जबतक पुजारी लघु षंका से निवृत होकर आए। ये पुजारी सारा दिन मुझे भक्तों के सामने नचाता रहता है और रात को बोतल मेरे सामने ही गटक मुझे चिढ़ाता है। कई बार तो उसके घरवाले मुझे गालियां देते हुए उसे उठा कर ले जाते हैं। अब तो मन करता है सुसाइड कर लूं।’
भगवान के आदेशों का पालन करने के तत्काल बाद मैं सरकारी विभाग में फंस गया। बेरोजगार आत्मा को मुक्ति मिली। काश! भगवान ये पहले बता देते तो आज को पांच सात साल की नौकरी भी हो गई होती।
वे कल षाम अचानक ही फिर मिले। बाजार में उसी जगह। बिल्कुल मांसाहारी से। उन्हें मदिरालय की परछाई से किनारे ले जाने लगा पर वे वहीं डटे रहे। मन उन्हें देख कुछ दुखी हुआ। बढ़ी हुई तोंद। पूरा बदन यों जैसे चार सूअरों की चर्बी उठाए हों। हो सकता है बेचारों को कोई रोग लग गया हो। सरकारी नौकरी में कोई न कोई रोग तो लग ही जाता है। ये रोग भी न, शरीफों को ही रगड़ता है। मैंने उनके पांव छुए, ‘और कैसे हो?’
‘ठीक हूं सर! मैं सरकारी भी नौकर हो गया।’
‘तो बधाई!’ उनसे अपने किराए के कमरे में पधार उसे पवित्र करने के लिए गुहार लगाई तो सहज मान गए। सोचा मंहगाई के दौर में इन्हें अपने घर ले पुण्य भी कमा जाएगा और किराए का कमरा भी शुध्द हो जाएगा। बातों ही बातों में बातों का सिलसिला शुरू हुआ, ‘और भगवन! कैसे चली ही नौकरी?’
‘मेरी प्रमोशन हो गई है!’
‘तो बहुत बहुत बधाई! मैं मन कठोर कर मलका की दाल साफ करने लगा तो उन्होंने पूछा, ‘ये क्या कर रहे हो?’
‘आपके लिए वैष्‍णवी भोजन…’
‘ये दाल शाल परे करो यार! क्या मरीजों का खाना खिला रहे हो। कुछ मुर्गा शुर्गा हो यार!’ कह वे अपने होंठ चबाने लगे।
‘मतलब???? मुझे काटो तो खून नहीं।’
‘यार! तब वैश्णव होना पदीय विवशता थी। अब अफसर हो गया हूं। वह भी ऐसे विभाग में जहां कब्ज के चलते मुंह लाख बंद भी रखो पर लोग हैं कि तब भी मुंह में कुछ न कुछ घुसेड़ ही जाते हैं। ये देखो! चार महीने में ही चौथी बार दांत बदलने पड़े हैं। दांत मुश्किल से बीस दिन भी निकाल पाते।’

मध्य प्रदेश में जारी है सामंती प्रथा

भारत देश को आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, भारत में गणतंत्र की स्थापना भी साठ पूरे कर चुकी है, बावजूद इसके आज भी देश के हृदय प्रदेश में मध्ययुगीन सामंती प्रथा की जंजरों की खनक सुनाई पड रही है। कहने को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा देश भर में सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के लिए ढेर सारे जतन किए हों, पर कागजी बातों और वास्तविकता में जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड रहा है। पिछले साल मानवाधिकार आयोग के सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश में सर पर मैला ढोने वाले लोगों की तादाद लगभग सात हजार दर्शाया जाना ही अपने आप में सबसे बडा प्रमाण माना जा सकता है। उधर देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में दलितों की हालत बद से बदतर ही है।
मध्य प्रदेश के अलावा देश के और भी सूबे एसे होंगे जहां सर पर मानव मल ढोने वालों की खासी तादाद होगी। मध्य प्रदेश में ही होशंगाबाद, सीहोर, हरदा, शाजापुर, नीमच, मंदसौर, भिण्ड, टीकमगढ, राजगढ, उज्जैन, पन्ना, छतरपुर, नौगांव, निवाडी आदि शहरों और एक दर्जन से भी अधिक जिलों में इस तरह की अमानवीय प्रथा को प्रश्रय दिया जा रहा है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस भले ही दलितों के उत्थान के लिए गगनभेदी नारे लगती रही हो पर सच्चाई यह है कि आज भी इसी कांग्रेस की नीतियों के चलते बडी संख्या में दलित समुदाय के लोग इस तरह की प्रथा के जरिए अपनी आजीविका कमाने पर मजबूर हैं। विडम्बना यह है कि आज भी हिन्दु धर्म में बाल्मिकी समाज तो मुस्लिमों में हैला समाज के लोग देश में सर पर मैला ढोने का काम कर रहे हैं।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज भी परंपरागत तरीके से सिर पर मैला ढोने का काम, शौचालयों की साफ सफाई, मरे पालतू या शहरों में पाए जाने वाले जानवरों को आबादी से दूर करने, नाले नालियों की सफाई, शुष्क शौचालयों के टेंक की सफाई, चिकित्सालय में साफ सफाई, मलमूत्र साफ करने के काम आदि को करने वाले दलित सुमदाय के लोगों का जीवन स्तर और सामाजिक स्थितियां अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही दयनीय है। सरकारों द्वारा इन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल अवश्य ही किया जाता हो, पर इन्हें मुख्य धारा में शामिल होने नहीं दिया जाता है। सरकारों द्वारा दलित उत्थान के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ इस वर्ग के दलित लोगों को ही मिल पाता है, इस बात में कोई संदेह नहीं है।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने अपनी दूसरी पंचवर्षीय योजना में सर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने की गरज से राज्यों और नगरीय निकाय संस्थाओं को शुष्क शौचालय बनाने के लिए नागरिकों को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय प्रावधान भी किए थे। आश्चर्य तो तब होता है जब इतिहास पर नजर डाली जाती है। 1971 में भारत सरकार ने दस साल की आलोच्य अवधि में सर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने हेतु चरणबध्द तरीके से अभियान चलाया था। दस साल तो क्या आज चालीस साल बीतने को हैं, पर यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है।
इसके बाद 1993 में सरकार की तंद्रा टूटी थी, तब सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय संनिर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया गया था, जिसके तहत प्रावधान किया गया था कि जो भी व्यक्ति यह काम करवाएगा उसे एक वर्ष के कारावास और दो हजार रूपए अर्थदण्ड की सजा का भोगमान भुगतना पड सकता है। कानून के जानकार बताते हैं कि देश में कुछ इस तरह के कानून और भी अस्तित्व में हैं, जो सर पर मैला ढोने की प्रथा पर पाबंदी लगाते हैं। रोना तो इसी बात का है कि सब कुछ करने के बाद भी चूंकि जनसेवकों की नीयत साफ नहीं थी इसलिए इसे रोका नहीं जा सका।
सरकार द्वारा इस काम में संलिप्त लोगों के बच्चों को अच्छा सामाजिक वातावरण देने, साक्षर और शिक्षित बनाने के प्रयास भी किए हैं। सरकार ने इसके लिए बच्चों को विशेष छात्रवृति तक देने की योजना चलाई है। इसके तहत बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी गई। मजे की बात यह है कि जिन परिवारों ने इस काम को छोडा और कागजों पर जहां जहां सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त होना दर्शा दी गई वहां इन बच्चों की छात्रवृत्ति भी बंद कर दी गई है।
देश के पिता की उपाधि से अंलकृत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को भुनाने में कांग्रेस द्वारा अब तक कोई कोर कसर नही रख छोडी है। बापू इस अमानवीय प्रथा के घोर विरोधी थे। बापू द्वारा उस समय के अपने शौचालय को स्वयं ही साफ किया जाता था। सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी के नाम को तो खूब कैश कराया है कांग्रेस ने पर जब उनके आचार विचार को अंगीकार करने की बात आती है तब कांग्रेस की मोटी खाल वाले खद्दरधारी नेताओं द्वारा मौन साध लिया जाता है।
दलित अत्याचार के मामले में यूपी कम नहीं
दलित परिवारों को प्रश्रय देने में उत्तर प्रदेश काफी हद तक पिछडा माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में 2006 में एससी एसटी के 1759, 2007 में 2410, तो 2008 में 2390 मामले दर्ज किए गए। आईपीसी के मामलों ने तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए। 2206 में 2238, 2007 में 3064 तो 2008 में इनकी संख्या बढकर 3543 हो गई थी। दलित महिलाओं की आबरू बचाने के मामले में 2006 से 2008 तक 255, 339 एवं 333 मामले प्रकाश में आए। ये तो वे आंकडे हैं जिनकी सूचना पुलिस में दर्ज है। गांव के बलशाली लोगों के सामने घुटने टेकने वाले वे मामले जो थाने की चारदीवारी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, उनकी संख्या अगर इससे कई गुना अधिक हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
खबरें तो यहां तक आ रहीं हैं कि दलित बच्चों के साथ शालाओं में भी भेदभाव किया जाता है। अनेक स्थानों पर संचालित शालाओं में दलित बच्चों को मध्यान भोजन के वक्त उनके घरों से लाए बर्तनों में ही खाना परोसा जाता है। इतना ही नहीं शिक्षकों द्वारा इन बच्चों को दूसरे बच्चों से अलग दूर बिठाया जाता है। देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी दासता का सूरज डूबा नहीं है। आलम कुछ इस तरह का है कि दलित लोगों के साथ अन्याय जारी है। गांव के दबंग लोग इनसे बेगार करवाने में भी नहीं चूक रहे हैं। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आजादी के बासठ सालों बाद भी गांवों में बसने वाला भारत स्वतंत्रता के बजाए मध्य युगीन दासता में ही उखडी उखडी सांसे लेने पर मजबूर है।

सांगोपांग समाज जीवन की शर्त है अन्त्योदय

19वीं सदी के अदभुत विचारक थे जॉन रस्किन। इनकी पुस्तक अन टू दी लास्ट पढ़ने के बाद महात्मा गांधी ने कहा कि अब मैं वह नहीं रह गया हूँ, जो मैं इस पुस्तक को पढ़ने के पहले था। इसी पुस्तक के शीर्षक का अनुवाद महात्मा जी ने किया अन्‍त्योदय। अन्‍त्‍योदय विचार को ही अंतत: महात्मा जी सर्वोदय विचार के रूप में परिभाषित किया। सर्वोदय में ही अन्‍त्‍योदय निहित है। समग्र से काट कर अंतिम व्यक्ति को न्यायपूर्वक विकसित नहीं किया जा सकता। महात्मा जी जिस भारतीय मनीषा के वाहक थे, इस अंग्रेज विचारक के तर्कों को पढ़ कर वे प्रभावित ही नहीं हुये, वरन् भारतीय मनीषा के संदर्भ में जो सवाल उनके मन में उठे थे, वे सब शांत हो गये, तब यह भी पुष्टि हुई कि भारत का चिंतन एक देशीय नहीं वरन् वैश्विक है।

भारतीय विचार प्रवाह के वाहक दीनदयाल:
भारतीय विचार प्रवाह के अधुनातन वाहक थे पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय। अपने समकालीन विचारमंथन की स्थिति को रेखांकित करते हुये उन्होंने कहा है, ”स्वातंत्र्योत्तर काल में भारतीय राजनैतिक दर्शन का विचार बिल्कुल नहीं हुआ यह कहना सत्य नहीं होगा किंतु अभी संकलित प्रयत्न करना बाकी है” गांधीजी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुये तथा भारतीय दृष्टिकोण से विचार करते हुये, सर्वोदय के विभिन्न नेताओं ने महत्वपूर्ण कल्पनाएं रखी हैं। किंतु विनोबा भावे ने ग्रामदान के कार्य को जो अतिरेकी महत्व दिया है, उससे उनका वैचारिक क्षेत्र का योगदान पिछड़ गया है। जयप्रकाश बाबू भी जिन पचड़ों में पड़ गये हैं, उससे उनका चिंतन का कार्यक्रम रुक गया है। रामराज्य परिषद् के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी ने भी रामराज्य और समाजवाद लिखकर पाश्चात्य जीवन दर्शनों की मीमांसा की है तथा अपने विचार रखे हैं, किंतु उनकी दृष्टि मूलत: सनातनी होने के कारण, वे सुधारवादी आकांक्षाओं व आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं करते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मा. स. गोलवलकर भी समय-समय पर भारतीय दृष्टिकोण से राजनैतिक प्रश्नों का विवेचन करते हैं। भारतीय जनसंघ ने भी एकात्म मानववाद के आधार पर उसी दिशा में कुछ प्रयत्न किया है। हिंदूसभा ने हिंदू समाजवाद के नाम पर समाजवाद की कुछ अलग व्याख्या करने का प्रयत्न किया है, किंतु वह विवरणात्मक रूप से सामने नहीं आया है। डॉ. संपूर्णानंद ने भी जो समाजवाद पर विचार व्यक्त किये हैं, उनके भारतीय जीवन दर्शन का अच्छा विवेचन है। चिंतन की इस दिशा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।”
भारतीय चिंतन की मूल प्रवृत्ति है समग्रता। एकांगिता के प्रति निरन्तर सावधान रहने के लिये भारत अपनी प्रतिभाओं को सम्प्रेरित करता रहा। इसी प्रेरणा ने महात्मा जी से अन्‍त्योदय की व्याख्या सर्वोदय विचार से करवाई। समाज की अंतिम सीढ़ी पर खड़ा व्यक्ति भी सब के साथ आना चाहिये यही अन्‍त्योदय का मंतव्य है। इस मंतव्य को समग्रता से व्यक्त करना था। अत: महात्मा जी ने इसे सर्वोदय कहा। आखिर समग्रता भी क्या है? दीनदयालजी ने समग्रता को एकात्मता के रूप में व्याख्यायित किया। पृथक-पृथक पड़ी विषमधर्मी अस्मिताओं को कृत्रिम गठबंधन नहीं है समग्रता। वरन् समग्रता इस सृष्टि की या ब्रह्माण्ड की एकात्मता का नाम है। यह न केवल समग्र है, वरन् एकात्म भी है। अत: समष्टि जीवन का कोई अंगोपांग समुदाय या व्यक्ति उत्पीड़ित उपेक्षित या वंचित रहता है तो वह समग्र यानी विराट पुरूष को विकलांग करता है। अत: दीनदयाल जी ने कहा सांगोपांग समाज-जीवन की आवश्यक शर्त है अंत्योदय। मानव की एकात्मता तब आहत हो जाती है, जब उसका कोई भी घटक समग्रता से पृथक पड़ जाता है। अत: समाज के योजकों को अंत्योदयी होनी चाहिये।
पाश्चात्य अर्थों के व्यक्तिवादी किंवा पूंजीवादी समर्थ्योदयी हैं। उनकी घोषणा ही है समर्थ ही जीयेगा (Survival of जhe fiजजesज) यह एक अमानवीय विचार है, जो समाज का निषेध कर मात्स्य न्याय की स्थापना करता है। पाश्चात्य अर्थों के समाजवादी किवां साम्यवादी सरकारोदयी होते हैं। वे व्यक्ति के एवं समाज के व्यक्तित्व का ही निषेध करते हैं तथा एक वर्ग की तानाशाही के माधयम से सामाजिक समता प्राप्त करने की परिकल्पना करते हैं। यह नितांत अवैज्ञानिक एवं राक्षसी विचार है। रूस व चीन ने इस त्रासद विचार को खूब सहा है, भारत में चलने वाले हिंसक नक्सलवाद की प्रेरणा का भी अधिष्ठान यही विचार है।
सामाजिक समता के घोषित लक्ष्य के कारण अनेक संवेदनशील व्यक्ति समाजवाद के विचार से जुड़ते हैं, तथा अनेक प्रकार से इसे मानवीय बनाने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रकार वैयक्तिक सामर्थ्य को सम्मानित करने के कारण एवं लोकतंत्र का पुरस्कर्ता होने के कारण व्यक्तिवाद तथा तथाकथित उदारवाद ने भी अनेक संजीदा व्यक्तित्वों को आकर्षित किया है, लेकिन दीनदयाल जी मानते हैं कि यह एक मृगमरीचिका है। हमें अपने भारतीय अधिष्ठान पर लौटकर, उसे ही युगानुकूल आकार देने के अपने स्वाभाविक कर्तव्य को निभाना होगा, अत: उन्होंने एकात्म मानव की साधना का आवाह्न किया।

व्यावहारिक उद्बोधन
इस विवेचन में किसी को भी वैचारिक दुरूहता का आभास हो सकता है, किसी को लग सकता है कि यह केवल दार्शनिक अठखेलियाँ हैं, लेकिन दीनदयाल जी ने एकात्म मानव के अंत्योदय दर्शन को अपने व्यवहार में जीया। दीनदयाल जी पांचजन्य में एक विचार-वीथी स्तम्भ लिखा करते थे। 11 जुलाई 1955 को अपने इस स्तम्भ में उन्होंने मानवीय श्रम एवं नवीन तकनीक (अभिनवीकरण) के संदर्भ में अपना विचार व्यक्त किया ”अभिनवीकरण का प्रश्न जटिल है तथा केवल मजदूरों तक सीमित नहीं है; अपितु अखिल भारतीय है। ……… वास्तव में तो बड़े उद्योगों की स्थापना एवं पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का आधार ही अभिनवीकरण है। आज का विज्ञान निरंतर प्रयास कर रहा है ऐसे यंत्रों का निर्माण करने का, जिनके द्वारा मनुष्यों का कम से कम उपयोग हो। जहाँ जनसंख्या कम है तथा उत्पादन के लिए पर्याप्त बाजार है वहाँ ये नए यंत्र वरदान सिद्ध होते हैं। हमारे यहाँ हरेक नया यंत्र बेकारी लेकर आता है।”
इसी प्रकार उन्होंने 18 जुलाई 1955 को अपने इसी स्तम्भ में दुकानहीन विक्रेताओं का सवाल खड़ा किया ”….. शायद जितने दुकानदार हैं, ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो बिना किसी दुकान के खोमचों, रेहडियों तथा ठेलों के सहारे अपनी जीविका चलाते हैं। दिल्ली नगरपालिका के उपनियमों के अनुसार इन लोगों को पटरियों पर बैठकर सामान बेचने की इजाजत नहीं है। दिल्ली के अधिकारियों के सामने टै्रफिक की ज्यादा समस्या है: क्योंकि इन पटरी वालों और खोमचे वालों के कारण सड़क पर इतनी भीड़ हो जाती है कि मोटर आदि का निकलना ही दुष्कर हो जाता है। फिर दुकानदारों को भी शिकायत है। सामने पटरी पर बैठे व्यापारियों के कारण उनकी दुकानदारी में बाधा पहुँचती है। नगर के सौंदर्य का भी प्रश्न है। टूटे-फूटे ठेलों और गंदे खोमचों से राजधानी की सड़कों का सौंदर्य मारा जाता है। फलत: दिल्ली सरकार ने पटरी वालों के खिलाफ जोरदार मुहिम छेड़ दी है।”
उपाध्‍याय ने गरीब खोमचेवालों व पुलिस के व्यवहार, उनकी हीनग्रंथियों व तज्जनित मनोविज्ञान का सजीव वर्णन अपने इस निबंध में करते हुये, अंत में लिखा है: ”आज देश में जिस प्रकार भूमिहीन किसानों की समस्या है, वैसे ही दुकानहीन व्यापारियों की समस्या है। हमें उनका हल ढँढ़ना होगा।”
समाज की सम्पत्ति का सीमित हाथों में केन्द्रीकरण अनुचित होता है। यह प्रवृत्ति मानव की एकात्मता को आहत करती है तथा वंचित समुदाय का सृजन करती है। इस संदर्भ में दीनदयाल जी की दृष्टि को समझने के लिये 1956 में विंधयप्रदेश की जनसंघ प्रदेश कार्यकारिणी ने दीनदयाल जी के निर्देश पर हीरा खदान मालिकों के विषय में एक प्रस्ताव पारित किया, उसको जानना अच्छा रहेगा।
”कार्यसमिति ने पन्ना-हीरा खदान जाँच समिति की रिपोर्ट पर संतोष व्यक्त किया। …. समिति ने कहा, जनसंघ उक्त जाँच समिति द्वारा सुझाये गये इस सुझाव से कि सरकार और जनता दोनों के सहयोग से एक स्वतंत्र कॉरपोरेशन बनाया जाय, के पक्ष में है। कार्यसमिति ने हीरा खदानों के लीज होल्डरों को मुआवजा देने का तीव्र विरोध किया और कहा कि उन लीज होल्डरों ने मिनरल कंसेशन रूल की धारा 48 व 51 का उल्लंघन किया है। अत: धारा 53 के अनुसार उनकी लीज जब्त होनी चाहिये।”
(पांचजन्य, 19 मार्च, 1956 , पृष्ठ 13)
ये उदाहरण दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित एकात्मता के अंत्योदयी संदर्भ को व्यावहारिक रूप से व्याख्यायित करते हैं।

अर्थनीति का भारतीयकरण एवं आर्थिक लोकतंत्र
भौतिक विकास किसी भी राष्ट्र की अर्थनीति का स्वाभाविक लक्ष्य होता है। दीनदयाल जी विकास के पाश्चात्य मॉडल को मानवीय एकात्मता के लिये अहितकर मानते थे अत: उन्होंने अर्थनीति के भारतीयकरण का आह्वान किया ”देश का दारिद्रय दूर होना चाहिये, इसमें दो मत नहीं; किंतु प्रश्न यह है कि यह गरीबी कैसे दूर हो? हम अमेरिका के मार्ग पर चलें या रूस के मार्ग को अपनावें अथवा युरोपीय देशों का अनुकरण करें? हमें इस बात को समझना होगा कि इन देशों की अर्थव्यवस्था में अन्य कितने भी भेद क्यों न हों इनमें एक मौलिक साम्य है। सभी ने मशीनों को ही आर्थिक प्रगति का साधन माना है। मशीन का सर्वप्रधान गुण है कम मनुष्यों द्वारा अधिकतम उत्पादन करवाना। परिणामत: इन देशों को स्वदेश में बढ़ते हुये उत्पादन को बेचने के लिए विदेशों में बाजार ढूँढने पड़े। साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद इसी का स्वाभाविक परिणाम बना। इस राज्य विस्तार का स्वरूप चाहे भिन्न भिन्न हो किन्तु क्या रूस को, क्या अमेरिका को तथा क्या इंग्लैण्ड को, सभी को इस मार्ग का अवलम्बन करना पड़ा। हमें स्वीकार करना होगा कि भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता मशीन का रास्ता नहीं है। कुटीर उद्योगों को भारतीय अर्थनीति का आधार मानकर विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का विकास करने से ही देश की आर्थिक प्रगति संभव है।
(पिलानी, शेखावटी जनसंघ सम्मेलन मे उदघाटन भाषण, पांचजन्य 12 दिसम्बर, 1955 पृ 11)
दीनदयाल जी अंत्योदय के लिये लोकतंत्र को आवश्यक मानते थे, लोकतंत्र राजनीति में अंतिम व्यक्ति की सहभागिता का आश्वासन देता है। दीनदयाल जी राजनैतिक लोकतंत्र की सार्थकता के लिये आर्थिक लोकतंत्र को भी परमावश्यक मानते थे। उनका मत है ”प्रत्येक को वोट जैसे राजनीतिक प्रजातंत्र का निकष है, वैसे ही प्रत्येक को काम यह आर्थिक प्रजातंत्र का मापदण्ड हैं।” प्रत्येक को काम के अधिाकार की व्याख्या करते हुये वे कहते है : ”काम प्रथम तो जीविकोपार्जनीय हो तथा दूसरे, व्यक्ति को उसे चुनने की स्वतंत्रता हो। यदि काम के बदले में राष्ट्रीय आय का न्यायोचित भाग उसे नहीं मिलता हो तो उसके काम की गिनती बेगार में होगी। इस दृष्टि से न्यूनतम वेतन, न्यायोचित वितरण तथा किसी न किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था आवश्यक हो जाती है।” दीनदयाल जी आगे कहते हैं:
”जैसे बेगार हमारी दृष्टि में काम नहीं है वैसे ही व्यक्ति के द्वारा काम में लगे रहते हुये भी अपनी शक्ति भर उत्पादन न कर सकना काम नहीं है। अण्डर इम्पलॉइमेण्ट भी एक प्रकार की बेकारी है।”
उपाध्‍याय उस अर्थव्यवस्था को अलोकतांत्रिक मानते हैं जो व्यक्ति के उत्पादन-स्वातंत्र्य या सृजनकर्म पर आघात करती है। अपने उत्पादन का स्वयं स्वामी न रहने वाला मजदूर या कर्मचारी अपनी स्वतंत्रता को ही बेचता है। आर्थिक स्वतंत्रता व राजनीतिक स्वतंत्रता परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। ”राजनीतिक प्रजातंत्र बिना आर्थिक प्रजातंत्र के नहीं चल सकता। जो अर्थ की दृष्टि से स्वतंत्र है वही राजनीतिक दृष्टि से अपना मत स्वतंत्रतापूर्वक अभिव्यक्त कर सकेगा। अर्थस्य पुरुषो दास: (पुरुष अर्थ का दास हो जाता है)”
मनुष्य के उत्पादन स्वातंत्र्य पर सबसे बड़ा हमला पूँजीवादी औद्योगीकरण ने किया है। अत: उपाध्‍याय औद्योगीकरण का इस प्रकार ने नियमन चाहते हैं कि जिससे वह स्वतंत्र, लघु एवं कुटीर उद्योगों को समाप्त न कर सके : ”आज जब हम सर्वांगीण विकास का विचार करते हैं तो संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार करके चलते हैं। यह संरक्षण देश के उद्योगों को विदेशी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा से तथा देश के छोटे उद्योगों को बड़े उद्योगों से देना होगा।” उपाध्‍याय यह महसूस करते हैं कि पश्चिमी औद्योगीकरण की नकल ने भारत के पारम्परिक उत्पादक को पीछे धकेला है तथा बिचौलियों को आगे बढ़ाया है। ”हमने पश्चिम की तकनीकी प्रक्रिया का ऑंख बंद करके अनुकरण्ा किया है। हमारे उद्योग का स्वाभाविक विकास नहीं हो रहा। वे हमारी अर्थव्यवस्था के अभिन्न व अन्योन्याश्रित अंग नहीं अपितु ऊपर से लादे गये है। (इनका विकास) विदेशियों के अनुकरणशील सहयोगी अथवा अभिकर्ता कतिपय देशी व्यापारियों द्वारा हुआ है। यही कारण है कि भारत के उद्योगपतियों में, सब के सब व्यापारी आढ़तियों तथा सटोरियों में से आए हैं। उद्योग एवं शिल्प में लगे कारीगरों का विकास नहीं हुआ है”
देश के आम शिल्पी व कारीगर की उपेक्षा करनेवाला औद्योगीकरण अलोकतांत्रिक है। पूँजीवाद व समाजवाद के निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के विवाद को उपाध्‍याय गलत मानते हैं। इन दोनों ने ही स्वयंसेवी क्षेत्र (Self Employed Secजor) का गला घोंटा है। आर्थिक लोकतंत्र के लिये आवश्यक है स्वयंसेवी क्षेत्र का विकास करना। इसके लिये विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था जरूरी है:
”राजनीतिक शक्ति का प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके जिस प्रकार शासन की संस्था का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार आर्थिक शक्ति का भी प्रजा में विकेन्द्रीकरण करके अर्थव्यवस्था का निर्माण एवं संचालन होना चाहिये। राजनीतिक प्रजातंत्र में व्यक्ति की अपनी रचनात्मक क्षमता को व्यक्त होने का पूरा अवसर मिलता है। ठीक उसी प्रकार आर्थिक प्रजातंत्र में भी व्यक्ति की क्षमता को कुचलकर रख देने का नहीं; अपितु उसको व्यक्त होने का पूरा अवसर प्रत्येक अवस्था में मिलना चाहिये। राजनीति में व्यक्ति की रचनात्मक क्षमता को जिस प्रकार तानाशाही नष्ट करती है, उसी प्रकार अर्थनीत में व्यक्ति का रचनात्मक क्षमता को भारी पैमाने पर किया गया औद्योगीकरण नष्ट करता है। इसलिए तानाशाही की भाँति ऐसा औद्योगीकरण भी वर्जनीय है।”
(आर्थिक लोकतंत्र शीर्षक के अन्तर्गत आये सभी उद्धरण दीनदयाल जी की पुस्तक भारतीय अर्थनीति: विकास की एक दिशा से लिये गये हैं)

एक गणितीय सूत्र ज x x x इ:
यन्त्रचलित औद्योगीकरण की मर्यादा को स्पष्ट करते हुये उपाध्‍याय एक समीकरण प्रस्तुत करते हैं: ”प्रत्येक को काम का सिध्दांत स्वीकार कर लिये जाए तो सम-वितरण की दिशा सुनिश्चित हो जाती है और हम विकेन्द्रीकरण की ओर बढ़ते हैं। औद्योगीकरण को उदेश्य मानकर चलना गलत है। इस सिध्दांत को गणित के सूत्र में यों रख सकते हैं:           ज  x क  x य  x इ
यहाँ जन का परिचायक है, कर्म की अवस्था व व्यवस्था का, यंत्र अथवा तकनीकि का तथा समाज की प्रभावी इच्छा या इच्छित संकल्प का द्योतक है। तथा तो सुनिश्चित है। और के अनुपात में तथा को सुनिश्चित करना है। लेकिन औद्योगीकरण लक्ष्य होने पर सब को नियंत्रित करता है। के अनुपात में जन की छँटनी होती है। के अनुपात में को भी यंत्रों के अति उत्पादन का अनुसरण करना पड़ता है। जो कि सर्वथा अवांछनीय है। की छँटनी कर देनी वाली कोई भी अर्थव्यवस्था अलोकतांत्रिक है। इ को नियंत्रित करने वाली अर्थव्यवस्था तानाशाही है। अत: तथा के नियंत्रण मे तथा का नियोजन होना चाहिये। वही लोकतांत्रिक एवं मानवीय अर्थव्यवस्था कही जा सकती है।                       (दीनदयाल उपाध्‍याय कृत ‘राष्ट्र जीवन की समस्यायें’ पृ 42)
एकात्म मानवदर्शन के अंत्योदय आयाम के लिये उन्होंने दृष्टिकोण के भारतीयकरण आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना, सत्ता एवं वित्त के विकेन्द्रीकरण तथा यंत्र योजित नहीं वरन् मानव योजित व्यवस्था के निर्माण का सांगोपांग आग्रह किया। हमें उनके इस आग्रह को दृष्टिपथ में रख कर सामाजिक अनुसंधान एवं प्रयोग संचालित करने चाहिये।

महानरेगा की महाआरती

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने देश में बढती महंगाई का अजीबोगरीब कारण महानरेगा के कारण आई समृद्धि को ठहराया है। शीला दीक्षित का बयान मंहगाई से पिसते गरीबो के जले पर नमक छिडकने जैसा है। महानरेगा ग्रामीण भारत की तस्वीर भले ही न बदल पायी हो परन्तु इसने सरपंचो की रंगत जरुर बदल दी है। महानरेगा में जहां ग्रामीणों को साल में 100 दिन काम की गारंटी है जिसमे प्रतिदिन 100 रुपये के हिसाब से भुगतान किया जाना है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने स्वंय स्वीकार किया है कि नरेगा में 70 फीसदी लोगों को एक दिन भी काम नहीं मिल पाया है।
महानरेगा यानि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, को लाने के पीछे उद्देश्य था कि अप्रशिक्षित ग्रामीण मानव शक्ति को गावों में ही रोजगार दिया जाये जिससे ग्रामीण मजदूरों की क्रयशक्ति बढे तथा स्थानीय बाजारों में व्यापार में वृध्दि हो। ग्रामीण महिलाओं को गावों में ही काम मिले जिससे उनका शोषण रोका जा सके और गावों से महानगरों की ओर पलायन रोका जा सके। इस प्रकार महानरेगा महानगरों को बचाने का उपक्रम था परन्तु हो यह रहा है कि उ.प्र. तथा बिहार से पंजाब जाने वाले खेतिहर मजदूरों की संख्या में भारी कमी आयी है। ऐसे मामले सामने आये हैं कि जिनमे जॉब कार्ड बनाने के बाद काम हिटाची मशीनों से करा लिया गया। और कमीशनखोरी के चलते मजदूरों को 100 दिनों के भुगतान के बिना काम के ही 1500 से 2000 रुपये देकर खानापूर्ति कर ली गयी। इस प्रकार के मामले सामने आने पर अब 1 अक्टूबर 2008 से इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये शासन ने मजदूरों को सीधे बैंकखातों से भुगतान करने की प्रक्रिया कर दी है तो कम कमीशन के कारण काम में सुस्ती आ गयी है और योजना को पलीता लगाने के नये तरीके इजाद किये जा रहे हैं।
महानरेगा की महाआरती की महातैयारी मध्यप्रदेश में अभी हाल में सम्पन्न हुये पंचायत चुनावों में में देखने को मिली। 22795 ग्राम पंचायतों के अर्न्तगत 55,393 गावों में 3,63,337 पंचों तथा 313 जनपदों में 6816 जनपद सदस्यों तथा 50 जिलों के 843 जिला पंचायत सदस्यों के मतदान में सर्वाधिक हिंसा सरपचं के पद के लिये हुयी। इस भारी मारा-मारी को देखकर प्रश्न किया जा सकता है कि हर कोई केवल सरपंच ही क्यों बनना चाहता है? लायसेंसी हथियारों के थानों में जमा होने के बाबजूद अवैध हथियारों के साथ इतनी अराजकता तो सांसद पद के लिये भी नहीं हुयी थी। कारण साफ है कि सरपंच की कुर्सी पाकर महानरेगा के महाबजट पर हाथ साफ करके अधिकतर सरपंच रातोंरात मालामाल होना चाहते हैं। 22795 ग्राम पंचायतों के लिये चालू वित्ताीय वर्ष 2009-10 में महानरेगा के लिये 39,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि एक पंचायत के हिस्से में औसत 1,71,52,884 रुपये तो केवल महानरेगा के ही है। जिसमें ग्रामीण विकास, जल संचय, कृषि, पौधरोपण, बाढ़ नियंत्रण, तालाबों का निर्माण, छोटे चैक डेम का निमार्ण, लोक निर्माण के अर्न्तगत आने वाले ऐसे कार्य जिनमे जान का जोखिम न हो करवाने के अधिकार सरपंच को दिये गये हैं। इन कामों के अलावा यदि 30 लाख रुपये प्रतिवर्ष का अतिरिक्त अन्य विभागों से मिलने वाला आबंटन भी इसमें जोड दिया जाये तो यह राशि 2 करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठती है जो एक सांसद निधि से भी अधिक है। पंचायती राज में सरपंच को जिस प्रकार के अधिकार दिये गये हैं उतने तो राष्ट्रपति को भी नहीं है। संरपच खुद सामान खरीदते हैं खुद ही बिल बना लेते हैं और खुद ही पास कर के चैक बना कर खुद ही पैसा बैंक से निकाल लेते हैं। एक ही पद पर इतने अधिकार भारतीय संबिधान में किसी भी संबिधानिक पद को प्राप्त नहीं है।
केन्द्रीय राज्यमंत्री प्रदीप जैन को अगस्त 2009 में टीकमगढ़ जिले के दौरे में एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों के बारे में नरेगा में गड़बड़ियों की 300 शिकायतें मिली थीं। यह किस्सा केवल एक जिले का हो ऐसा नहीं है पूरे प्रदेश में कमोवेश हालात ऐसे ही हैं। 2005 से शुरु हुयी इस योजना में पिछले तीन सालों मे कमीशनखोरी और निमार्ण कार्य में की गयी गंभीर अनियमितताओं से मजदूरों के हकों के पैसे का बंदरबांट किया जा रहा है। पैसे की इस बारिश ने सरपंचो और महानरेगा से जुडे लोगों को तरबतर कर दिया है और यही कारण है कि जो युवा कल तक अपने गांव और खेतों की ओर उपेक्षा से देखते थे वे अब गांवों की राजनीति में गहरी रुचि ले रहे हैं। पंचायत चुनावों में इस बार जिला डेलीगेट और डेलीगेट से भी ज्यादा रुचि सरपंच के पद को लेकर रही है क्यों कि ग्रामों में होने वाले सभी कार्यो के लिये नोडल ऐजेन्सी ग्राम पंचायत ही होती है। यंहा तक कि बीपीएल सूची में भी सरपंच की अनुशंसा से ही नाम दर्ज होता है। विगत पांच वर्षो की तस्वीर देखें तो साफ पता चलता है कि महानरेगा ने ग्रामीण मजदूरों को दो जून की रोटी की व्यबस्था भले ही न कर पायी हो परन्तु सरपंचों और संबधितों को मलाई जरुर दी है। एक अनुमान के मुताबिक लगभग तीन चौथाई सरपंचों के पास लक्जरी चारपहिया बाहन हो गये है। जब कि नरेगा को लागू हुये कुल तीन ही साल हुये हैं।
केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डॉ सी पी जोशी के खुद के निर्वाचन क्षेत्र भीलवाडा की 11 ग्राम पंचायतों में हुई एक बर्ष की सोशल ऑडिट में एक ग्राम पंचायत में ही 20 लाख रुपये का फर्जीवाडा सामने आया है यह तो केवल नमूना है सारे देश में ही महानरेगा का महा घालमेल चल रहा है। चुनावों मे इस बार सरपंच पद के लिये जिस प्रकार धन और बल लगाया गया है वह सरपंच बनने के बाद महानरेगा से ही महाबसूली होनी है। धन के इस प्रवाह ने सरपंच की हैसियत डेलीगेट और जिला डेलीगेट से से भी ज्यादा कर दी है। डेलीगेट और जिलाडेलीगेट का महत्व तो जनपद अध्यक्ष और जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के बाद किसी विशेष काम का का नहीं रह जाता है, जबकि सरपंच के पास पांच सालों तक विकास कार्यों के नाम पर धन का सतत् प्रवाह बना रहता है।

सेक्स उद्योग और सैन्य मिशन

सारी दुनिया में सेक्स उद्योग में आई लंबी छलांग के दो सबसे प्रमुख कारण हैं पहला है युद्ध और दूसरा है उन्नत सूचना एवं संचार तकनीकी। आज वेश्यावृत्ति और पोर्न दोनों का ही औद्योगिकीकरण हो चुका है। विश्व स्तर पर वेश्यालयों के कानूनी संरक्षण,वेश्यावृत्ति को कानूनी स्वीकृति दिलाने का आन्दोलन तेजी से चल रहा है इस मामले में सबसे आगे विकसित पूंजीवादी मुल्क हैं।
विकसित पूंजीवादी मुल्कों में वेश्यावृत्ति पेशा है। वेश्याएं सरकार को टैक्स अदा करती हैं। सन् 2001 में जर्मनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दे दी गयी। अब वेश्यावृत्ति वहां पर अनैतिक धंधा नहीं रह गया है। बल्कि नैतिक और कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त धंधा है। वेश्याएं शरीर बेचने के बदले सरकार को टैक्स देती हैं। अब वेश्याओं को पुलिस परेशान नहीं करती। प्रति वेश्या प्रतिमाह 180 डॉलर टैक्स देना होता है।
एक अनुमान के अनुसार वेश्यावृत्ति के धंधे में प्रतिवर्ष 40 लाख नयी लड़कियां और दस लाख बच्चे आ रहे हैं। वेश्यावृत्ति वस्तुत: गुलामी है। इसका लक्ष्य है शारीरिक और कामुक शोषण, इस शोषण का अर्थ है कामुक उत्तेजना, कामुक शांति और वित्तीय लाभ। नयी विश्व व्यवस्था ने कानूनों एवं नियमों में ढिलाई एवं परिवर्तन का जो दबाव पैदा किया है उसके कारण सेक्स और पोर्न संबंधी कानूनों में भी बदलावा आया है। सेक्स और पोर्न संबंधी कानून ज्यादा उदार बने हैं, इसके कारण सेक्स उद्योग और पोर्न उद्योग के प्रति अलगाव और अनैतिक भाव नष्ट हुआ है।
अब पोर्न और सेक्स उद्योग सम्मानित उद्योग हैं। इस उद्योग में काम करने वाले समाज में आज सम्मानित हैं। पोर्न एवं सेक्स उद्योग की वैधता के कारण स्त्री और बच्चों का शारीरिक शोषण और भी बढ़ा है। हमारे समाज में जो लोग भूमंडलीकरण के अमानवीय चरित्र की उपेक्षा करके उसकी अंधी हिमायत में लगे हैं उन्हें फिलीपीन्स के अनुभवों से सबक हासिल करना चाहिए।
फिलीपींस में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक आदि के इशारों पर स्त्रीमुक्ति का जो रास्ता अख्तियार किया गया वह वह स्त्री को आत्मनिर्भर नागरिक नहीं बनाता, बल्कि सेक्स बाजार में ठेलता है।लेबर एक्सपोर्ट के नाम पर साठ और सत्तर के दशक में बड़े पैमाने पर फिलीपीनी औरतों का निर्यात किया गया।सत्तर के दशक में मध्य-पूर्व में निर्माण उद्योग के लिए मर्दो का निर्यात किया गया। सत्तर और अस्सी के शक में फिलीपींस के बाहर काम करने वाली अधिकांश औरतें ही थीं। वियतनाम युद्ध के बाद वेश्यावृत्ति का विश्वबाजार तेजी से विकसित होता है।
अमेरिका, ब्रिटेन,फ्रांस आदि देशों की सेनाओं ने जिन देशों में हस्तक्षेप किया,जिन इलाकों में अपने सैनिक अड़डे बनाए उनके आसपास के देशों में वेश्यावृत्ति तेजी से फैली। यही स्थिति संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में चलने वाले शांति मिशन अभियानों की है। शांति मिशन अभियानों में शामिल सैनिकों को औरतों और बच्चों की तस्करी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है।
सोमालिया, मोगादिसु, साइप्रस, कम्बोडिया, सर्बिया, बोसनिया, कोसोवो आदि इलाकों में शांति सैनिक औरतों की तस्करी करते पकड़े गए हैं।
कम्बोडिया में 1992-93 के शांतिमिशन के समय वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी। 25 फीसदी से ज्यादा सैनिक एचआईवी पॉजिटिव होकर लौटे। सोमालिया में फ्रेंच सैनिकों ने वेश्यावृत्ति में कई गुना इजाफा कर दिया।
सन् 2002 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा इटली के शहर तूरिन में ” प्रोस्टयूशन ,सेक्स ट्रेफिकिंग एण्ड पीसकीपिंग” शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार आयोजित किया गया। जिसमें यह तथ्य सामने आया कि शांति मिशन के कार्य जब चरम पर होते हैं तब ही वेश्यावृत्ति और अन्य देशों के लिए औरतों कह बिक्री अचानक बढ़ जाती है।यह स्थिति निकोशिया, फामुगुस्ता, बुडापेस्ट, कोसोवो, डिली-डारविन, नोमपेन्ह-बैंकाक, होंडुररास, अल-सल्वाडोर, ग्वाटेमाला,सोमालिया आदि देशों में देखी गयी है।
आज स्थिति यह है कि भूमंडलीय विचारकों के दबाव के कारण भूमंडलीय आतंकवाद, जनसंहारक अस्त्र, सर्वसत्तावादी या आततायी राज्य, शक्ति संतुलन, भूमंडलीकरण आदि विषयों पर चतरफा काम हो रहा है।ये विषय सर्वोच्च प्राथमिकता की कोटि में हैं। किन्तु ‘सेक्स ट्रेफिकिंग’ सर्वोच्च वरीयता की सूची के बाहर है। उसे ‘वूमेन्स स्टैडीज’, ‘थर्ड वर्ल्ड डवलपमेंट’, ‘एरिया स्टैडीज’ आदि क्षेत्रों के हवाले करके हाशिए पर फेंक दिया गया है। जबकि इसे वरीयता क्रम में ऊपर रहना चाहिए। इस तरह से ‘सेक्स ट्रेफिकिंग’ से बौध्दिकों का अलगाव बढ़ा है। वे इसे एक विच्छिन्न विषय या घटना मात्र समझते हैं। विकासमूलक अर्थव्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं। सवाल उठता है कि क्या इस तरह हाशिए पर रखकर इस समस्या का सही अध्ययन संभव है? इस विषय पर जो मूल्यांकन मिलते हैं उनमें सेक्स ट्रेफिकिंग के विवरण ज्यादा होते हैं। इस तरह के मूल्यांकनों में मूलत: निम्न बातों पर जोर रहता है,जैसे, ग्राहक मनोरंजन के लिए औरतों का शोषण कर रहे हैं। दलाल मुनाफे के लिए शोषण कर रहे हैं। जो औरतें बेची जा रही हैं वे उत्पीडित हैं। इस तरह मूल्यांकन इस समस्या के समाधान की रणनीति बनाने में मदद नहीं करते। इनसे समाधान की कोई बुनियादी रणनीति नहीं निकलती।
जहां वेश्यावृत्ति वैध है वहां सरकार धन कमाती है,किन्तु जहां अवैध है वहां भ्रष्ट अधिकारी और अपराधी गिरोह चांदी काटते हैं।वेश्यावृत्ति के कारोबार में व्यापार का मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि नयी औरतों का फ्लो कितना है। नयी औरतें कितनी आ रही हैं।विदेशी औरते कितनी आ रही हैं। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के महिला संगठनों की 1991 में एक काँफ्रेंस हुई जिसमें अनुमान लगाया गया कि सत्तर के बाद से सारी दुनिया में तीन करोड़ औरतें बेची गयी हैं।जापान से सालाना एक लाख औरतें जहाजों में भरकर लाकर सेक्स उद्योग के हाथ बेची जाती हैं। ये औरतें ‘वार’ और वेश्यालयों में काम करती हैं। वर्मा, नेपाल, थाईलैण्ड, बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान से सालाना तीन लाख से ज्यादा औरतें बिक्री होती हैं।
सन् 1960 और 1970 के दशक में आईएमएफ और विश्वबैंक ने पर्यटन पर ज्यादा जोर दिया। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर जोर दिया।होटल और रिसोर्ट बनाने को प्राथमिकता दी।जिससे विदेशी पूंजी को आकर्षित किया जा सके। इस पर्यटन का एक आकर्षक हिस्सा सेक्स पैकेज हुआ करता था।जिसमें हवाईभाड़ा, होटल का भाड़ा,औरत या मर्द जो भी चाहिए, उसका भाड़ा, कार आदि का खर्चा शामिल हुआ करता था।विश्तनाम युद्ध के कारण अकेले सैगोन में पांच लाख वेश्याएं थीं। जबकि युद्ध के पहले सैगोन की कुल आबादी ही पांच लाख की थी।
वियतनाम युद्ध के कारण फिलीपींस,कोरिया,कम्बोडिया,थाईलैण्ड आदि देशों में वेश्यावृत्ति कई गुना बढ़ गयी। इसी तरह ओकीनावा में अमेरिकी सैन्य अड्डा बनने के बाद नए किस्म के विश्राम और आनंद के केन्द्रों का व्यापक पैमाने पर आसपास के इलाकों में निर्माण कियागया। इन सभी देशों में वेश्यावृत्ति को वैध बनाने के लिए कानून पास किए गएंसत्तर के दशक में मनीला और बैंकाक वेश्यावृत्ति के दो बड़े केन्द्र बनकार उभरे। उसके बाद नेपाल का विकास हुआ।इन तीन केन्द्रों ने सेक्स पर्यटन को तेजी से बढ़ावा दिया।सिर्फ सेक्स पर्यटन के कारण ही इन केन्द्रों की अरबों डालर की सालाना आय थी।मसलन् थाईलैण्ड में प्रतिवर्ष 50 लाख पर्यटक आते हैं। इनमें 75 फीसदी पुरूष होते हैं। सेक्स उद्योग के नए क्षेत्रों में कर मुक्त इलाके, औद्योगिक क्षेत्र, पूंजी विकास केन्द्र औरतों की बिक्री के बड़े केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं।

मीडिया में ‘साहित्य’ का बाजारीकरण

वर्षों से मीडिया में अपनी पैठ बना चुके साहित्य को भी पूंजीवादी संस्कृति ने नहीं बख्शा है। इसके झंझावाद में फंसे साहित्य की कसमसाहट भी सामने दिखती हैं। व्यवसायिक होती मीडिया ने खबरों को माल की तरह बेचना प्रारंभ कर दिया है। बदलते परिवेश में साहित्य के लिए मीडिया कोई जगह नहीं। आज मीडिया में ‘साहित्य’ का बाजारीकरण हो गया है।
प्रिंट हो या फिर इलैक्ट्रोनिक मीडिया, साहित्य का दायरा धीरे-धीरे सिमटता ही जा रहा है। पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि पहले अधिकांशत: साहित्यिक अभिरूचि वाले लोग ही पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया करते थे। यही नहीं, पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य को खास अहमियत दी जाती रही थी। पत्रकारिता का जन्म साहित्यिक अभिरूचि का ही परिणाम है। इस बात को दरकिनार कर दिया गया।
हिन्दी पत्रकारिता के उदय काल में भी ऐसे कई पत्र थे, जिनमें राष्ट्रीय चेतना की उद्बुद्ध सामग्री होने के साथ-साथ साहित्यिक सामग्री प्रचुर मात्रा में रहा करती थी। ‘भारत मित्र’, ‘बंगवासी’, ‘मतवाला’, ‘सेनापति’, ‘स्वदेश’, ‘प्रताप’, ‘कर्मवीर’, ‘विश्वमित्र’, आदि कई पत्रों में साहित्य को खासा स्थान दिया जाता था। भारतेन्दु काल में ही हिन्दी साहित्य की आधुनिकीकरण की प्रकिया की शुरुआत हुई थी। इसी दौर में हिन्दी पत्रकारिता का विकास उत्तरोत्तर होता रहा। भारतेन्दु जी के संपादन में ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चन्द्रचन्द्रिका’, ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ और ‘बाला-बोधिनी’ में समसामयिक विषयों के अलावा साहित्य को खास महत्व दिया गया। भारतेन्दु युग में साहित्यिकारों ने पत्रकारिता के माध्यम से साहित्य को दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिन्दी प्रदीप’ और प्रताप नारायण मिश्र ने ‘ब्राहम्ण’ पत्र निकाल कर कार्य को आगे बढ़ाया। वहीं द्विवेदी युग में ‘सरस्वती’ के बारे में कहा जाता है कि यह साहित्य और पत्रकारिता के एक पर्याय के रूप में सामने आया था। ‘सरस्वती’ ने साहित्य और पत्रकारिता के मानदंडों की जो पृष्ठभूमि बनायी, वह आज भी मिसाल है। ‘सरस्वती’ ने जो सिलसिला प्रारंभ किया था उसे और व्यापक बनाने में ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘मतवाला’, ‘समन्वय’, ‘विशाल भारत’, ‘चांद’, ‘हंस’, आदि पत्रों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
आजादी के बाद भी कई ऐसे साहित्यकार सक्रिय रहे जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता से जुड़ कर साहित्य के प्रचार प्रसार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ‘विशाल भारत’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’ से अज्ञेय जुड़े रहे, तो ‘धर्मयुग’ से धर्मवीर भारती और ‘सारिका’ से कमलेश्वर। हालांकि कमलेश्वर ‘श्रीवर्षा’ और ‘गंगा’ के भी संपादक रहे। राजेन्द्र यादव ‘हंस’, रघुवीर सहाय ‘दिनमान’, भैरव प्रसाद गुप्ता, भीष्म साहनी एवं अमृतराय ‘नयी कहानी’, शैलेश मटियानी ‘विकल्प’, महीप सिंह ‘संचेतना’, मनोहर श्याम जोशी ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ आदि कई चर्चित साहित्यकार हैं जिन्हें साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता के लिये भी जाना जाता है। उस दौर के सारे पत्र बडे पूंजीपति घरानों से ही संबध्द थे और आज भी हैं, लेकिन आज एक बड़ा बदलाव आ गया है ।
बढ़ते खबरिया चैनलों के बीच साहित्य को उतना स्थान नहीं मिल पा रहा है जो आकाशवाणी या दूरदर्शन पर मिलता रहा है। हालांकि इसमें भी गिरावट देखी जा रही हैं। आकाशवाणी से समय समय पर कई साहित्यिकार जुडे। भगवतीचरण वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, नरेंद्र शर्मा, फणीश्वर नाथ रेणु, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय आदि कई साहित्यकार हैं जो आकाशवाणी से जुड़े रहे। वहीं, दूरदर्शन पर भी साहित्य की विभिन्न विधाओं का नियमित प्रचार प्रसार होता रहा है। एक समय था जब दूरदर्शन पर भीष्म साहनी की ‘तमस’ को दिखाया गया, तो घर-घर में साहित्य की चर्चा होने लगी थी। कई चर्चित साहित्यकारों की कृतियों को लेकर धारावाहिक बनें। जिनमें प्रेमचंद की निर्मला, शरत चन्द्र का ‘श्रीकांत’, रेणु का ‘मैला आंचल’, विमल मित्र की ‘मुजरिम हाजिर हो’, श्रीलाल शुक्ल की ‘रागदरबारी’, आर.के.नारायणन का ‘मालगुडी डेज’ आदि काफी चर्चित रहा है। अब रियलीटी शो का जमाना है। सच के नाम पर, सनसनी के नाम,रोमांच पैदा करने के नाम पर आदि आदि …..।
खबर को मसालेदार बना कर बेचे जाने के बीच साहित्य नही के बराबर है। हर कोई मीडिया प्रेम को छोड़ नहीं पा रहा है। बाजारवाद की वजह से आम खास होते मीडिया की मोह-माया से साहित्य भी नहीं बच पाया है। साहित्य को आम खास तक पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पडता है। जाहिर है पत्र-पत्रिकाएं ही साहित्य को आम और खास लोगों तक पहुंचा सकती है। शायद ही कोई ऐसा पत्र हो जिसमें साहित्य किसी न किसी रूप में न छपता हो। इसके बावजूद मीडिया का रवैया साहित्य के साथ अच्छा नहीं प्रतीत होता है। तभी तो समाचार पत्रों के आकलन से साफ तौर पर पता चलता है कि अमूमन सभी अखबार साहित्य की दो से तीन प्रतिशत ही खबरें प्रकाशित करते हैं।
साहित्य, मीडिया में आज केवल ‘फिलर’ के रूप में दिखता है। खास तौर से प्रिंट मीडिया ने बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते प्रकोप में साहित्य को वस्तु के रूप में ही रखा है। वर्षो से सप्ताह में साहित्य को पूरा एक पेज देने वाले अखबार अब विज्ञापन को प्राथमिकता दे रहे हैं। विज्ञापन विभाग इतना हावी है कि साहित्य के बने पूरे पृष्ठ को अंतिम क्षण में बदलवा देता है।
मजेदार बात यह है कि यह सब कुछ खेल या फिर सिनेमा के नियमित फीचर पेज के साथ कतई नहीं होता है। और यह सब हर स्तर पर छपने वाले अखबारों के साथ होता है। अमूमन राष्ट्रीय और स्थानीय अखबार अपने फीचर पेज में साहित्य से संबंधित सामग्री छापते हैं। मासिक-साप्ताहिक व्यवसायिक पत्रिकाएं भी साहित्य को वैसे ही देख रहे हैं जैसे अखबार। इंडिया टुडे का साहित्यिक विशेषांक का लोगों को खासा इंतजार रहता था। वहीं पर कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों का भी विशेषांक छपना लगभग बंद हो गया है। गिनी चुनी पत्र-पत्रिकाएं ही कभी-कभार साहित्यिक विशेषांक निकालते हैं।
पिछले कई वर्षो से अखबारों के चरित्र में व्यापक बदलाव हुआ है। किसी पत्र में रविवारीय परिशिष्ट को अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें हर विधा पर सामग्री होती है और उसमें साहित्य को खासा स्थान दिया जाता है। लेकिन आज उसमें भी ठहराव साफ दिखता है। रविवारीय परिशिष्ट आज भूत-प्रेत, रहस्य, अपराध और सिनेमा को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। उसमें साहित्य को ढूंढ़ना पड़ता है। बाजार के मुताबिक फिल्म, सेहत, तंत्र-मंत्र, मनोंरजन, अपराध, भविष्यवाणी, और रेसिपी आदि के बढ़ते क्रेज के सामने साहित्य दबता जा रहा है। जहां थोडी सी जगह मिल भी जा रही है, उसके संपादक के साहित्य प्रेम को ही आधार माना जा सकता है।
चर्चित साहित्यकारों के जन्म दिन या साहित्यिक समाराहों को तरजीह न देकर फिल्मी हीरो-हीरोइनों के विवाह करने, मंदिर जाने जैसी खबरों को खास बनाते हुए पूरा परिशिष्ट निकालने में मीडिया मषगूल है। चर्चित साहित्यकार कमलेश्वर के निधन की खबर को ही लें, कितनों ने खास परिशिष्ट निकाला वह आपके सामने है? इसमें केवल पत्र ही शामिल नहीं बल्कि खबरिया चैनल भी शामिल है। किसी साहित्यकार पर उनका फोकस नहीं होता है। वहीं पर अश्लील और फूहड़ चुटकुलों से लोगों को हंसाने जैसे कार्यक्रम को दिखाने की होड़ लगी रहती है। यों तो साहित्य की खबरें चैनलों पर आती नहीं, आती भी है तो चंद मिनटों में समेट दी जाती है।
साहित्य व साहित्यिकारों से जुड़ी खबरें स्थान पाती भी है तो मुष्किल से वहीं हीरो-हीरोइन-खिलाड़ियों को ज्यादा तरजीह दी जाती है। जाहिर है साहित्य नहीं बिकता और जो बिकता है उसे मीडिया तरजीह देने में लगी है।

अदालत का सामना करें ‘भगोड़े’ हुसैन: विहिप

अदालत का सामना करें ‘भगोड़े’ हुसैन: विहिप

विश्व हिन्दू परिषद ने कहा है कि हिंदू देवी-देवताओं के अश्लील चित्रकारी कर चर्चित हुए विवादित चित्रकार एम.एफ. हुसैन को अपने कुकृत्यों के कारण चल रहे मुकदमों का डटकर सामना करना चाहिए।

विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. सुरेन्द्र जैन ने शुक्रवार को संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हुसैन को भगोड़े अपराधियों की तरह भारत से भागने के बजाए, भारत में आकर न्यायपालिका का सामना करना चाहिए।
डा. जैन ने कहा कि कला के नाम पर भारत माता और हिंदू देवी-देवताओं के अश्लील चित्रण के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, इसको हुसैन अपने समर्थकों से ज्यादा समझते हैं। इसलिये उनके समर्थन में चलाये जा रहे अभियानों से वे प्रभावित नहीं हो रहे।
इस बीच विहिप प्रवक्ता ने साफ कहा कि, ‘एम.एफ. हुसैन हिन्दूवादी संगठनों से डरकर नहीं अपितु अपने कुकृत्यों की वजह से चल रहे मुकदमों के संभावित परिणामों से डरकर भारत से भागे थे।’
उन्होंने कहा कि भारत माता का नंगा चित्र बनाते समय उन्हें अवश्य स्मरण रहा होगा कि उन्होंने मदर टेरेसा और फातिमा का चित्रण शालीनता के साथ किया था। उनका यह दोहरा मापदंड आंख पर पट्टी बांधने वाले समर्थकों को शायद नहीं दिखाई दे रहा है। डा. जैन ने कहा कि हुसैन का समर्थन करने वाले कलाकारों को बीबी फातिमा और मदर टेरेसा के अश्लील चित्र बनाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की दुहाई देनी चाहिए।
विहिप प्रवक्ता ने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद किसी भी व्यक्ति की आस्था का अपमान करने के पक्ष में नहीं है। इसीलिये जब बड़ोदरा के एक चित्रकार ने जीसस का अपमानजनक चित्र बनाया था तो हमने उसका विरोध किया था। परन्तु तस्लीमा नसरीन और एम.एफ. हुसैन के कृत्यों से भारत की सैक्युलर बिरादरी का दोगलापन स्पष्ट हो गया है। उन्होंने कहा कि जब पंजाब के किसी अखबार में जीसस का आपत्तिजनक चित्रण होता है, कर्नाटक में कोई मनगढ़ंत लेख छपता है या किसी स्वीडिश पत्रकार के चित्रों से अकारण हिंसा भड़कती है एवं तथा निर्दोष हिंदुओं के जानमाल पर हमला किया जाता है तो ये सेक्युलर बिरादरी गला फाड़कर आस्थाओं के सम्मान की बात करती है परन्तु कोई भी हिंसा की निंदा नहीं करता।
डा. जैन ने कहा कि एम.एफ. हुसैन को कतर ने अपनी नागरिकता हिन्दू धर्म के अपमान के कारण दी है न कि कला के सम्मान के लिए। विहिप प्रवक्ता ने कहा कि भारत का हिंदू समाज किसी भी प्रकार की आलोचना से डरने वाला नहीं है।

 

 

‘जनवाणी’ से ‘सत्ता की वाणी’ तक का सफर…

मीडिया पर आये दिन सवाल खड़े हो रहे हैं, विश्वसनीयता भी कम हुई है। बाजारीकरण का मीडिया पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। खबरों और मीडिया के बिकने के आरोपों के साथ-साथ कई नए मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में पत्रकारिता को किसी तरह अपने बूढे क़न्धों पर ढो रहे पत्रकारों के माथे पर बल जरूर दिखायी दे रहे हैं।
भारत में पत्रकारिता का इतिहास बड़ा गौरवशाली रहा है। आजादी के दीवानों की फौज में काफी लोग पत्रकार ही थे, जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक देश व समाज के लिये कार्य किये। लेकिन ये बातें अब किताबों और भाषणों तक ही रह गई हैं। जैसी परिस्थितियों से उस दौर के पत्रकारों को गुजरना पड़ता था] आज के पत्रकारों को भी सच कहने या सच लिखने पर वैसे ही दौर से गुज़रना पड़ता है। सच कहने वालों को सिरफिरा कहा जाता है और उन्हें नौकरी नहीं मिलती] मिल जाये तो उन्हें निकाल दिया जाता है। इसके बावजूद भी कई ऐसे लोग है जो सही पत्रकारिता कर रहे हैं।
2009 के लोकसभा चुनावों में मीडिया का वो स्वरूप देखने को मिला जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी, वो था मीडिया का बिकाऊ होना। हालांकि चुनाव के समय में इस तरह की छुटपुट घटनाएं सामने आती रहती थीं, लेकिन इस बार सारी हदें पार हो गईं। कुछ अखबार व कुछ समाचार चैनलों को छोड़ दें तो पूरा मीडिया बिका हुआ नजर आया। ऐसा होना सच में शर्मनाक था और लोकतन्त्र के लिये दुर्भाग्यपूर्ण। खबरें, यहां तक कि संपादकीय भी पैकेजों में बेचे जाने लगे। एक पृष्ठ पर एक ही सीट के दो-दो उम्मीदवारों को मीडिया विजयी घोषित करने लगा और हद तो तब हो गई जब मीडिया ने पैकेज न मिलने पर प्रबल उम्मीदवार के भी हारने के आसार बता दिये।
पैसे से पत्रकार व पत्रकारिता खरीदी जा रही है। लेकिन जो बिक रहा है शायद वो पत्रकारिता का हिस्सा कभी था ही नहीं। सत्ता में बैठे लोगों की भाषा आज की पत्रकारिता बोल रही है और नहीं तो पैसे की भाषा तो मीडिया द्वारा बोली ही जा रही है। कुछ एक को इन बातों से ऐतराज हो सकता है, लेकिन आंखे बंद करके चलना भी ठीक नहीं है। बाकी मीडिया का जनवाणी से सत्ता की वाणी बनने तक का सफर काफी कुछ इसी तरह चलता रहा।
रही-सही कसर पत्रकारिता में आए नौजवानों ने पूरी कर दी है। एक ओर ज्ञान की कमी, दूसरी ओर जल्दी सब कुछ पा लेने की इच्छा और पैसे कमाने की होड़ ने इन्हें आधारहीन पत्रकारिता की ओर मोड़ दिया है। प्रतिस्पर्धा के दबाव ने भी नौजवानों को पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता करने पर विवश कर दिया है। वैसे दोष उनका भी नहीं है। लाखों रूपए खर्च करने के बाद बने इन डिग्रीधारक पत्रकारों से मूल्यों की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
खैर, हम तो बस इसी ख्याल में बैठे हैं कि मीडिया जल्द ही पुन: जनवाणी बन जायेगा… लेकिन मन यही कहता है कि, ‘दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है गालिब…।’

मीडिया और राजनीति- अंतर्सम्बन्ध

मीडिया में प्रिंट हो या इलेक्टनॅनिक दोनों के विषय में जन मानस के बीच अनेक प्रकार के विचार सुनने को मिलते हैं, कोई इसे वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने वाला सशक्त माध्यम मानता है तो कुछ इसके बारे में ऐसी भी धारणा रखते हैं कि आजादी के बाद इसने अपना नैतिक स्तर खो दिया है। यह सिद्धांतों के लिए समर्पित नहीं, व्यक्ति सापेक्ष हो गई है। पत्रकारिता समाज व राष्टन् की प्रबोधिनी न होकर बाहुबलियों और शक्तिशालियों की दासी बन उनकी चाटुकारिता में ही अपना हित देखती है। निश्चित ही इन भाव-विचारों के बीच आज के दौर में इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि युग के अनुकूल परिस्थितियाँ बनती और बिगडती हैं। पहले धर्मदण्ड राज्य व्यवस्था से ऊपर माना जाता था तथा वह राजा के कर्तव्यों के निर्धारण के साथ आवश्यकता पडने पर उसके अनैतिक आचरण के विरूद्ध दण्ड भी देनें की शक्ति रखता था, जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सेक्युलर राज्य की अवधारणा ने धर्मदण्ड की शक्ति का हृास किया है, अब राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि (नेता) ही सर्वशक्तिमान है और राजनीतिक सत्ता सर्वोपरि है।
भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भ हैं सत्ता चलाने वाले (एक्जिक्युटिव्ह), कानून बनाने वाले (लेजिस्लेटिव्ह) तथा न्याय देने वाले (ज्यूडिशिअरी)। इन तीन स्तम्भों के सहारे ही भारतीय राज्य व्यवस्था का सम्पूर्ण तानाबाना बुना हुआ है। मंत्री परिषद् कोई योजना या नियम बनाती है, उसकी अच्छाई-बुराई को जनता के सामने रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। जिसे वह अपने जन्मकाल से स्वतंत्र रूप से करती आ रही है। इसके बारे में भारतीय संविधान की 19वीं धारा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अधिकार के अंतर्गत विस्तार से दिया गया है। इस अनुच्छेद ने मीडिया को सार्वभौमिक शक्ति प्रदान की है जिससे वह प्रत्येक स्थान पर अपनी पैनी नजर रखते हुए स्व विवेक के आधार पर घटना से सम्बन्धित सही-गलत का निर्णय कर सके । यह ओर बात है कि जाने-अनजाने मीडिया की इस नजर से अनेक भ’ष्ट लोग हर रोज आहत होते हैं। ऐसे लोग आए दिन माँग भी करते हैं कि मीडिया पर ऍंकुश लगना चाहिए। उनका तर्क है कि जब कानून का शिकंजा सभी पर कसा हुआ है फिर मीडिया क्यों उससे अछूती रहे ? खासकर मीडिया और राजनीति के अंतर्सम्बन्धों को लेकर यह बात बार-बार उछाली जाती है।
यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि 15 अगस्त 1947 से आजाद गणतंत्र के रूप में भारत ने जिस शासन प्रणाली को स्वीकारा है। वह जनता का जनता द्वारा जनता के लिए संचालित लोकतंत्रात्मक शासन है, जिसमें प्रगति के पथ पर पीछे छूट चुके व्यक्ति की चिंता रखना और उसके हित में कार्य करने को सबसे अधिक वरियता दी गई है। इस व्यवस्था में जनता से चुने गए प्रतिनिधि शासन का संचालन करते हैं, यह प्रणाली जन प्रतिनिधियों को अपार अधिकार प्रदत्त करती है। चूंकि मीडिया जनता के प्रति जबावदेह है इसलिए वह महाषियों और नेताओं का तथ्यपरख-तटस्थ लेखा-जोखा जनता तक पहुँचा देती है। अत: मीडिया और राजनीति एक दूसरे की सहयोगी बनकर कार्य करती दिखाई देती हैं।
सन् 1977 में कोलकाता में जब जेम्स आगस्टस हिकी ने भारत में सबसे पहले प्रेस की स्थापना की ओर 1980 से बंगाल गजट एण्ड कैलकटा जनरल एडवरटाइजर नामक दो पन्नों का अखबार शुरू किया था तब और उसके बाद प्रकाशित समाचार पत्र-पत्रिकाएँ उदन्त मार्तण्ड हरिश्चन्द्र मैगजीन, सर्वहित कारक, प्रजाहित, बनारस अखबार, प्रजाहितैषी, सरस्वती, बाल बोधनी, भारत जीवन, हिन्दी प्रदीप, ब्राम्हण, हिन्दुस्तान, अभ्युदय, प्रताप, कैसरी, कलकत्ता समाचार, स्वतंत्र, विश्वमित्र, विजय, आज, विशाल भारत, त्याग भूमि, हिंदू पंच, जागरण, स्वराज, नवयुग, हरिजन सेवक, विश्वबन्धु, हिन्दू, राष्ट्रीयता, चिंगारी, जनयुग, सनमार्गआदि ही क्यों न हों, प्राय: आजादी के पूर्व निकले इन सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं पर यह आरोप लगे थे कि क्यों यह राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनेताओं पर अपनी नजर गढाए रखते हैं तथा व्यवस्था परिवर्तन के बारे में लिखते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् बीते 62 सालों के बाद भी मीडिया पर यह आरोप यथावत् है। व्यवस्था में खामियाँ इतनी अधिक हैं कि उन पर मीडिया लगातार प्रहार कर रही है। यहाँ आरोप लगाने वाले भूल जाते हैं कि यही पत्रकारिता विकास के मॉडल तथा योजनाओं को जनता तक पहुँचाती है। न केवल मीडिया सूचना पहुँचाती है बल्कि जन के मानस को इस बात के लिए तैयार करती है कि सृह्ढ भविष्य के भारत निर्माण तथा अपने राज्य, नगर, ग्राम के हित में किस पार्टी को अपना बहुमूल्य वोट दें।
आज मीडिया के उद्देश्यों को लेकर दो तरह की विचारधाराएँ प्रचलित हैं। एक मीडिया को शुध्दा व्यवसाय मानते हैं तो दूसरा वर्ग इसे जन संचार का शक्तिशाली माध्यम होने के कारण जनकल्याण कारक, नैतिक मूल्यों में अभिवध्र्दाक, विश्व बन्धुत्व और विश्व शांति के लिये महत्वपूर्ण मानता है। दोनों के ही अपने-अपने तर्क हैं। वस्तुत: इन तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान पत्रकारिता जहाँ व्यवसाय है वहीं परस्पर प्रेम, जानकारी और शक्ति बढाने का माध्यम भी है।
बोफोर्स, तेलगी, नोट कांड, भ’ष्टाचार से जुडी तमाम धांधलियाँ, भारत की सीमाओं में अवैध घुसपैठ, नकली करेंसी, हवाला के जरिए धन का आवागमन, आतंकवादी गतिविधियाँ और कुछ माह पूर्व आई लिब’हान रपट ही क्यों न हो। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्टनॅनिक मीडिया द्वारा जो बडे-बडे खुलासे किये गये, वह समय-समय पर पत्रकार को मिली राजनेताओं की मदद-सूचना एवं सहयोग का परिणाम है। वस्तुत: पत्रकार को राजनेता से बने आपसी सम्बन्धों का लाभ जीवन भर मिलता है। एक पत्रकार उस नेता को जिसका उससे मित्रवत् व्यवहार है आवश्यकतानुसार उसे प्रोत्साहित करता है, उसके हित में समाचार लिखता है। बदले में उससे ऐसे अनेक समाचार प्राप्त करता है जो न केवल पत्रकार की खोजी प्रवृत्ति के कारण उसके संस्थान में प्रतिष्ठा दिलाते हैं, बल्कि उसे मीडिया जगत में एक विश्वसनीय ब’ांड की तरह स्थापित करते हैं।
जब पत्रकार कोई नकारात्मक समाचार लिखता है तब भी वह अप्रत्यक्ष जनता का हित ही साध रहा होता है। आप राजनीति और मीडिया के इन अंर्तसम्बन्धों को चाहें तो स्वार्थ के सम्बन्ध भी कह सकते हैं बावजूद इसके यह नकारा नहीं जा सकता कि पत्रकार द्वारा धन-यश प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास सदैव आमजन के हित में रहा है। जब एक नेता, दूसरे नेता की तथा प्रशासक-कर्मचारी दूसरे अधिकारी-कर्मचारी की खामियों, नीतियों, उनके काले कारनामों को उजागर करते हैं तब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वह जनहित से जुडे विषयों को मीडिया में रखने का कार्य करते हैं। भ’ष्टाचार की कलई खुलने पर जो राशि प्राप्त की जाती है उसका बहुत बडा भाग केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा जन कल्याणकारी योजनाओं में खर्च किया जाता है।
स्वाधीनता आंदोलन के समय और उसके बाद भारत में मूल्यों के संरक्षण संवर्धन तथा उनकी स्थापना का कार्य मीडिया निरंतर कर रही है। यही उसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षक बनाता है। जब तक भारत में लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था रहेगी तब तक मीडिया और राजनीति में अंर्तसम्बन्ध बने रहेंगे। इस पर कोई भी बहस की जाए वह अधूरी रहेगी।

महिला सशक्तिकरण: कितनी हकीकत कितना फसाना

महिला सशक्तिकरण की दिशा में हालांकि दुनिया के कई देश कई महत्वपूर्ण उपाय कांफी पहले कर चुके हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी महिलाओं के लिए संसदीय सीटों में आरक्षण की व्यवस्था की जा चुकी है। लगता तो है कि अब भारतवर्ष में भी इस दिशा में कुछ रचनात्मक कदम उठाए जाने की तैयारी शुरु कर दी गई है। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को आरक्षण दिया जाना और वह भी राजनीति जैसे उस क्षेत्र में जहां कि आमतौर पर पुरुषों का ही वर्चस्व देखा जाता है वास्तव में एक आश्चर्य की बात है। परंतु पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के इस सपने को साकार करने का जिस प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मन बनाया है तथा अपने कांग्रेस सांसदों को महिला आरक्षण के पक्ष में मतदान करने की अनिवार्यता सुनिश्चित करने हेतु व्हिप जारी किया है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पुरुष नेता भले ही भीतर ही भीतर इस बिल के विरोधी क्यों न हों परंतु सोनिया गांधी की मंशा भांपने के बाद फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस का कोई नेता राज्‍यसभा में इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद अब लोकसभा में इसके विरुध्द अपनी जुबान खोल सकेगा।
बात जब देश की आधी आबादी के आरक्षण की हो तो भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस से लाख मतभेद होने के बावजूद ख़ुद को महिला आरक्षण विधेयक से अलग नहीं रख सकती लिहाजा पार्टी में कई सांसदों से मतभेदों के बावजूद भाजपा भी फिलहाल इस विधेयक के पक्ष में खड़ी दिखाई दे रही है। हालांकि इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि जिस प्रकार मनमोहन सिंह की पिछली सरकार के समय भारत अमेरिका के मध्य हुआ परमाणु क़रार मनमोहन सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत साबित हुआ था तथा उसी मुद्दे पर वामपंथी दलों ने यू पी ए सरकार से अपना समर्थन तक वापस ले लिया था। ठीक वैसी ही स्थिति महिला आरक्षण विधेयक को लेकर एक बार फिर देखी जा रही है। परंतु पिछली बार की ही तरह इस बार भी कांग्रेस के इरादे बिल्कुल सांफ हैं। ख़बर है कि एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने सोनिया गांधी से यह पूछा कि उन्हें लोकसभा में महिला आरक्षण की मंजूरी चाहिए या वे सरकार बचाना चाहेंगी। इस पर सोनिया गांधी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें महिला आरक्षण की मंजूरी चाहिए।
उक्त विधेयक को लेकर देश की संसद में पिछले दिनों क्या कुछ घटित हुआ यह भी पूरा देश व दुनिया देख रही है। रायसभा के 7 सांसदों को सभापति की मो पर चढ़ने तथा विधेयक की प्रति फाड़ने व सदन की गरिमा को आघात पहुंचाने के जुर्म में सदन से निलंबित तक होना पड़ा था। राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी व लोक जनशक्ति पार्टी के इन सांसदों द्वारा महिला आरक्षण विधेयक के वर्तमान स्वरूप को लेकर जो हंगामा खड़ा किया जा रहा है वह भी हास्यास्पद है। इन दलों के नेता यह मांग कर रहे हैं कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के कोटे में ही दलितों, पिछड़ी जातियों तथा अल्पसंख्यकों की महिलाओं हेतु आरक्षण किया जाना चाहिए। अब यह शगूफा मात्र शगूंफा ही है या फिर इन पार्टियों के इस कदम में कोई हंकींकत भी है यह जानने के लिए अतीत में भी झाकना णरूरी होगा। महिलाओं के 33 प्रतिशत सामान्य आरक्षण की वकालत करने वाले लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव तथा रामविलास पासवान जैसे विधेयक के वर्तमान स्वरूप के विरोधियों से जब यह पूछते हैं कि आप लोग अपनी- अपनी पार्टियों के राजनैतिक अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक के किन्हीं पांच ऐसे सांसदों, विधायकों या विधान परिषद सदस्यों के नाम बताएं जिन्हें आप लोगों ने दलित, पिछड़ा तथा अल्पसंख्यक होने के नाते पार्टी प्रत्याशी के रूप में किसी सदन का सदस्य बनवाया हो। इसके जवाब में इन नेताओं के पास कहने को कुछ भी नहीं है। इसी से यह सांफ ज़ाहिर होता है कि दलितों, पिछड़ी जातियों तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के नाम पर किया जाने वाला इनका हंगामा केवल हंगामा ही है हकीकत नहीं।
दरअसल जो नेता महिला आरक्षण विधेयक का विरोध जाति के आधार पर कर रहे हैं उनकी मजबूरी यह है कि उनके हाथों से पिछड़ी जातियों व अल्पसंख्यकों के वह वोट बैंक तोी से खिसक रहे हैं जो उन्हें सत्ता मे लाने में सहयोगी हुआ करते थे। लिहाजा यह नेता पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की महिलाओं को अतिरिक्त आरक्षण दिए जाने के नाम पर महिला आरक्षण विधेयक का जो विरोध कर रहे हैं वह वास्तव में एक तीर से दो शिकार खेलने जैसा ही है। इन जातियों के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर यह नेता जहां अपने खिसकते जनाधार को पुन: बचाना चाह रहे हैं वहीं इनकी यह कोशिश भी है कि किसी प्रकार उनके विरोध व हंगामे के चलते यह विधेयक पारित ही न होने पाए। और इस प्रकार राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व पूर्ववत् बना रहे।
महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ी तमाम और ऐसी सच्चाईयां हैं जिन्हें हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। हालांकि महिलाओं द्वारा आमतौर पर इस विषय पर ख़ुशी का इजहार किया जा रहा है। आरक्षण की ख़बर ने देश की अधिकांश महिलाओं में जोश भर दिया है। परंतु इन्हीं में कुछ शिक्षित व सुधी महिलाएं ऐसी भी हैं जो महिला आरक्षण को ग़ैर जरूरी और शोशेबाजी मात्र बता रही हैं। ऐसी महिलाओं का तर्क है कि महिला सशक्तिकरण का उपाय मात्र आरक्षण ही नहीं है। इसके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय ऐसे हो सकते हैं जिनसे कि महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष लाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर महिलाओं हेतु नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया जाना चाहिए। महिलाओं पर होने वाले यौन उत्पीड़न संबंधी अपराध तथा दहेज संबंधी अपराधों में अविलंब एवं न्यायसंगत फैसले यथाशीघ्र आने चाहिएं तथा इसके लिए और सख्त कानून भी बनाए जाने चाहिए। कन्या भ्रुण हत्या को तत्काल पूरे देश में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए तथा इसके लिए भी और सख्त कानून भी बनाए जाने की जरूरत है। खेलकूद में महिलाओं हेतु पुरुषों के बराबर की व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी एवं गैर सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को आरक्षण दिया जाना चाहिए। और यह आरक्षण चूंकि देश की आधी आबादी के लिए दिया जाना है अत: इसे 33 प्रतिशत नहीं बल्कि 50 प्रतिशत किया जाना चाहिए। वृद्ध ,बीमार तथा घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता व इन्हें आश्रय दिये जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। व्यवसाय हेतु महिलाओं को प्राथमिकता के आधार पर बैंक लोन मुहैया कराए जाने चाहिए। लिात पापड़ जैसी ग्राम उद्योग संस्था से सीख लेते हुए सरकार को भी इसी प्रकार के अनेक महिला प्रधान प्रतिष्ठान राष्ट्रीय स्तर पर संचालित करने चाहिए।
रहा सवाल महिलाओं की सत्ता में भागीदारी हेतु संसद में महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत किए जाने का तो इसमें भी शक नहीं कि राजनीति में महिलाओं की आरक्षित भागीदारी निश्चित रूप से राजनीति में फैले भ्रष्टाचार में कमी ला सकेगी। संसद व विधानसभाओं में आमतौर पर दिखाई देने वाले उपद्रवपूर्ण दृश्यों में भी लगभग 33 प्रतिशत कमी आने की संभावना है। संसद में नोट के बंडल भी पहले से कम उछाले जाऐंगे। परंतु यह सब तभी संभव हो सकेगा जबकि देश की लोकसभा में उक्त विधेयक पेश होने की नौबत आ सके और उसके पश्चात लोकसभा इस विधेयक को दो-तिहाई मतों से पारित भी कर दे। और चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है इसलिए देश की आधी से अधिक अर्थात् लगभग 15 विधानसभाओं में भी इस विधेयक का पारित होना जरूरी होगा। चूंकि बात भारत में महिला सशक्तिकरण को लेकर की जा रही है इसलिए आज महिला आरक्षण के पक्ष में सबसे अधिक मुखरित दिखाई दे रही कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी से ही जुड़ी कुछ महिलाओं से संबंधित अतीत की ऐसी ही बातों का उल्लेख यहां करना संबध्द पक्षों को शायद बुरा तो बहुत लगेगा परंतु इतिहास ने समय के शिलालेख पर जो सच्चाई दर्ज कर दी है उससे भला कौन इंकार कर सकता है। याद कीजिए जब एक महिला अर्थात् सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के करीब थी उस समय सुषमा स्वराज व उमा भारती के क्या वक्तव्य थे। यह महिला नेत्रियां उस समय सोनिया गांधी के विरोध में अपने बाल मुंडवाने, भुने चने खाने व घर में चारपाई उल्टी कर देने जैसी बातें करती देखी जा रही थीं। आज भाजपा व कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में लगभग एकजुट दिखाई पड़ रहे हैं। इन दोनों ही पार्टियों को वे दिन भी नहीं भूलने चाहिए जबकि दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के दौरान तथा गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार के संरक्षण में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान न जाने कितनी औरतों के पेट फाड़कर उनके गर्भ से बच्चों को निकाल कर चिता में डाल दिया गया। अनेक महिलाओं को जीवित अग्नि के हवाले कर दिया गया। अनेकों के स्तन तलवारों से काट दिए गए। बड़े अफसोस की बात है कि महिलाओं पर यह अत्याचार भी इन्हीं राजनीति के विशेषज्ञों के इशारे पर किया गया था जो आज महिला सशक्तिकरण की बातें कर रहे हैं। और इसीलिए अविश्वसनीय से लगने वाले इस विधेयक को देखकर यह संदेह होना लाजमी है कि इसमें कितनी हकीकत है और कितना फसाना।