Monday, January 18, 2010

अर्थशास्‍त्र के स्थापित सिद्धांत बदल गये हैं बिहार में


अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को मानें तो बिना उधोग-धंधों के विकास के, किसी भी प्रदेश की विकास की बात करना बेमानी है। आमतौर पर माना जाता है कि विकास की प्रथम सीढ़ी कृषि के क्षेत्र में विकास का होना होता है। विकास का रास्ता खेतों से निकल कर के ही कल-कारखानों के ऑंगन तक जाता है। उसके बाद ही वह सेवा क्षेत्र की ओर रुख कर पाता है।

बीमारु राज्य के रुप में पहचाने जाने वाले बिहार में 2004-09 के दौरान जादुई तरीके से विकास हुआ और इसने 11.03 फीसदी के दर के ऑंकड़े को आसानी से प्राप्त कर लिया।

भारतीय सांख्यकीय संगठन ने जब इस रपट को सार्वजनिक किया तो पूरा देश अविश्वास और आश्चर्य भरी मिश्रित प्रतिक्रिया से लबरेज हो गया। दूसरे प्रदेशों खास करके विकसित राज्यों के लिए यह लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

ऐतिहासिक और क्लासिकल सिद्धांत के अनुसार अर्थशास्त्र के स्थापित सिध्दांत के तरीके के अलावा किसी दूसरे तरीके से विकास नहीं हो सकता है। जैसा कि हम जानते हैं विभाजन के बाद से ही बिहार कल-कारखानों और बेशकीमती खनिज पदार्थों दोनों से महरुम रहा है।

उधोग-धंधों, बिजली और अन्य संसाधनों की कमी से जुझते हुये बिहार के लिए सिर्फ कृषि के बलबूते पर विकास के 11.03 फीसद जैसे ऊँचे दर को प्राप्त करना मुश्किल था। कृषि के अलावा इस विकास में सेवा क्षेत्र, निमार्ण क्षेत्र, होटल-रेस्त्रां और संचार की क्रांति के योगदान को भी हम कम कर के नहीं ऑंक सकते हैं।

विकासशील देशों को छोड़ दें तो विकसित देशों के विकास में सेवा क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है। पर पिछड़े प्रदेशों में ऐसा होना संभव नहीं हो पाता है। फिर भी बिहार ने इस मिथ को बदला है और साथ ही विकास के वाहकों में हो रहे बदलाव की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

सही प्रकार से औधोगिकीकरण की बयार कभी भी बिहार में बह नहीं पाई। फिर भी वहाँ सेवा क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ। यह अर्थशास्त्र के मापदंडों के जरुर खिलाफ है, पर है एकदम सच।

सेवा क्षेत्र में विकास का ही नतीजा था कि बिहार में कृषि और कुटीर उधोगों के विकास को बल मिला। संचार और निर्माण क्षेत्र में भी इसी वजह से विकास हुआ। मनीआर्डर उधोग ने भी इस पूरे कवायद में अपनी सकारात्मक भूमिका निभायी है।

प्रवासी बिहारियों ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ये प्रवासी बिहारी अपने परिवारों को मनीआर्डर के जारिये पैसा भेजते हैं, जिससे निर्माण क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। यह विकास निजी और सार्वजनिक दोनों स्तरों पर गति को पकड़े हुए है। परिणामत: सीमेंट और स्टील उधोग को इससे फायदा पहुँच रहा है। वितीय वर्ष 2008-09 में स्टील और सीमेंट क्षेत्र में विकास की गति इसके कारण भी सामान्य रही है।

बिहार में, सेवा क्षेत्र के विकास में संचार क्रांति का योगदान 17.4 फीसदी है। आज पूरे देष में मोबाईल धारकों की संख्या तकरीबन 500 मिलियन हो गयी है। मोबाईल के क्षेत्र में थ्री जी सुविधा की भी जल्द ही शुरुआत होने जा रही है।

बिहार के दूर-दराज के गाँवों में भी मोबाईल की पहुँच हो गई है। यह रोजगार का एक विकल्प बनकर पूरे देश में उभरा है। मोबाईल और इसके सिम को खरीदने और बेचने का कार्य गाँवों में जोर-शोर से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि इससे वर्तमान में वे अपनी आमदनी का 60 फीसदी आय अर्जित करते हैं। बिहार के ग्रामीण जनों ने इस विकल्प का जम कर फायदा उठाया है। उन्होंने इसका इस्तेमाल अपने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए भी की है। इतना ही नहीं वे इसके जरिये अपनी जानकारी को भी बढ़ा रहे हैं। बाजार पर उनकी इसके माध्यम से हमेशा नजर रहती है।

बिहार में विकास के बरक्स में यह कहना होगा कि निश्चित रुप से अब बिहार में स्वरोजगार के प्रतिषत में तेजी से इजाफा हुआ है। सरकारी नौकरी के अलावा अब बिहारी निजी क्षेत्र में जाने के अलावा स्वरोजगार पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

बिहार में विकास कीे स्थिति के ऊपर किये गये हालिया सर्वेक्षण से स्पष्ट हो गया है कि अब वहाँ के विकास में स्वरोजगार का योगदान 40-50 फीसदी है और बिहार में आये इस बदलाव का ही नतीजा है कि बिहार में विकास दर तेजी से बढ़ रहा है।

अर्थषास्त्री भी बिहार में टूटते अर्थशास्त्र के मानकों पर हैरान हैं। रिसर्च की जरुरत पर जोर दिया जा रहा है। जबकि इन सबसे अनजान अभी भी बिहार में बैंकिग सुविधाओं से वंचित वर्ग को बैंकिग सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। मोबाईल बैंकिग की सुविधा का विस्तार हो रहा है।

इससे स्पष्ट है कि बिहार में संचय की प्रवृति को बल मिल रहा है। बेरोजगारी के काले बादल तेजी से छीज रहे हैं। लोगों में जागरुकता भी आ रही है। विकास के अन्यान्य विकल्पों को भी वहाँ अपनाया जा रहा है। बड़े कल-कारखानों की जगह कुटीर उधोग पर ध्यान दिया जा रहा है।

अब जरुरत है कि बिहार की तरह दूसरे पिछड़े प्रदेश भी अर्थशास्त्र के पुरातन नियम-कानूनों से हटकर बिहार के नक्शे-कदम पर अपने सपनों को साकार करने का प्रयास करें। निश्चित रुप से बिहार की तरह सफलता जरुर उनकी अंकशायिनी बनेगी।

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